साये की तरह मेरा साथ, तुम निभाना ना कभी,

साये की तरह मेरा साथ, तुम निभाना ना कभी,
चिराग ले कर मेरे अंधेरों में, आना ना कभी।
गर्दिशें भाती हैं मझे, वो तन्हा सितारा हूँ मैं,
फ़ना क्षितिज पर, मेरे साथ हो जाना ना कभी।
मौसम पतझड़ का हूँ, मुरझाना फ़ितरत है मेरी,
बनकर गलीचा सूखे पत्तों का, मेरे साथ बिछ जाना ना कभी।
वादियों में जो खो जाती है, वैसी गूंज हूँ मैं,
घाटियों की जमीं का एहसास, मेरे साथ हो जाना ना कभी।
उदासियों को भी जो रुला दे, वैसी राग हूँ मैं,
मृगतृष्णा के मेरे अनुराग में, खुद को भटकाना ना कभी।
अधूरे सपनों का जीवित, एक ताज हूँ मैं,
बेफिक्री में मुझे, सर पर बिठाना ना कभी।
विरक्ति भी डूब जाती है, संवेदनशून्यता में मेरी,
मृत भावनाओं का पुरस्कार, मेरे साथ हो जाना ना कभी।
खुद से है अनजान, वैसे जज़ीरे सी पहचान है मेरी,
मेरे नाम की खामोशी में, खुद को सताना ना कभी।
साहिलों पर टूटती, हर लहर का आख़री अरमान हूँ मैं,
बेखुदी की गहराइयों में, मेरे साथ उतर जाना ना कभी,
जो मिटा दी गयी, वैसे शब्दों का संन्यास हूँ मैं,
अनकहे शब्दों का घर, मेरे लिए तुम हो जाना ना कभी।
बर्फीली ऊंचाइयों में रचा, एक खोया उपन्यास हूँ मैं,
बनकर एक किरदार, मेरे पन्नों में सिमट जाना ना कभी।