*त्रिभंगी छंद* सममात्रिक
‘गणेश वंदन’
गणपति गणनायक,सब सुख दायक,
मोदक जिन को, है भाता।
घट-घट के वासी, विघ्न विनाशी,
ऋद्धि सिद्धि के, हैं दाता।।
है मूषक वाहन, गज का आनन,
एक दंत से, विख्याता।
गौरा के नंदन, हे दुख भंजन,
सब जग उनके, गुण गाता।।
वेदों के ज्ञाता, बुद्धि विधाता,
मात-पिता के, प्यारे हैं।
गज कर्ण रुद्र प्रिय ,भोला भाला,
जग के खेवन, हारे हैं।।
शशि सोहे मस्तक, कर में पुस्तक,
पाश हस्त में, धारे हैं।
आसन चतुरानन, अनुज षडानन,
देव आँख के, तारे हैं।।
-गोदाम्बरी नेगी (हरीद्वार)