प्रेम
धरती बोली… अम्बर से !
मेरा तुम्हारा प्रेम जन्म जन्मांतर से !!
तुम हृदय विशाल, तुम अनंत आकाश !
तुम उन्नति के प्रतीक, जन-मन की आस,
रिमझिम वर्षा, गुनगुनाती धूप,
इन्द्रधनुष सा सुंदर रूप मेरे मन को भाता है !
पर कड़कती बिजली ओले और तूफान सा
तुम्हारा रौद्र रूप मुझे हर पल डराता है !!
मैं भय अनहोनी से पल-पल घबराती हूं !
रो-रोकर नदी रूपी आंखों से नीर बहाती हूं !!
हमारा युगों-युगों का नाता है !
त्याग समर्पण विश्वास हमारे प्रेम की अमर गाथा है !!
तभी अम्बर बोला..
तुम क्षमाशील, मुझ नीलांबर की नील
तुम धैर्य साहस की प्रतिमूर्ति साक्षात् दुर्गा शक्ति हो !
तुम प्रकृति की अनुपम कृति होकर
मेरी प्राण प्रिए धरती हो !!
मेरा चलना, मचलना, हंसना, रूठना
तुम्हें पाने, मनाने के लिए होता है !
तुम्हारी दूरी, मेरी मजबूरी और विरह वेदना से
मेरा तन-मन पोर-पोर विलख-विलख कर रोता है !!
तुम्हारे विरह की आग जब बिजली बनकर
मुझे जलाती है, तो मैं बादल की गर्जना के रूप में
चीखता-चिल्लाता हूं !
जिसे शीतल करने के लिए वर्षा रूपी आंसू बहाता हूं !!
प्रिय धरती ! सच ! बताऊं…
मैं तुम्हारे वियोग-वेदना की वह राधा और सीता हूं !!
सारी सुध-बुध खोकर आंसू पी-पीकर…
तुमसे मिलन की आस लिए युगों-युगों से जीता हूं !!
• विशाल शुक्ल