चमकती है बहुत

ये नए दौर की दुनिया है चमकती है बहुत
इसकी हर चीज़ , उछालो तो ख़नकती है बहुत
मैंने नज़दीक से देखे हैं बदन के हिस्से
मन तो कचरा है मगर देह महकती है बहुत
तुमने ओढ़ी तो है शोहरत की ये चादर लेकिन
बड़ी हल्की है ये चादर ये सरकती है बहुत
एक और एक को ग्यारह ये समझ लेती है
बस यही ऐब है पब्लिक में भड़कती है बहुत
— शिवकुमार बिलगरामी