नरेंद्रकृत “तरु चालीसा”

नरेंद्रकृत “तरु चालीसा”
दोहा
नमन तरु महाराज को,इनका हो गुणगान ।
कवि”नरेंद्र”विनती करे, तरु का करना मान।।
विविध नाम से लोग पुकारे।
पाए जाते जग में सारे।। 1
तरु वृक्ष रुख महीरूह विटप।
द्रुम पेड़ गाछ और पादप।। 2
नमन मेरा सभी तरुवर को।
बेल नीम पीपल वटबर को।। 3
मदार पलाश पाकड़ चंदन।
गूलर खैर शमी को वंदन।। 4
रहें आप भू के हर कोना।
आप कहलाते हरा सोना।। 5
आप एक ही जीवनदाता।
आप धरा के भाग्य विधाता।। 6
कार्बन डाई गैस पचाते।
घोर गरल पी हमें बचाते । 7
अहर्निश निकाल ऑक्सीजन।
जीवित रखते हैं जन जीवन।। 8
अखिल विश्व के आप सहारे।
नतमस्तक मनुज देव सारे।। 9
जब ईश्वर ने रची थी सृष्टि।
जल थल गगन अनल और वृष्टि।। 10
फिर भी रचना हुई न पूरी।
वायु बिना थी सृष्टि अधूरी।। 11
प्राणवायु दे कौन अनवरत।
तभी आपकी पड़ी जरूरत । 12
आपकी उत्पत्ति हुई त्वरित।
बीज अंकुरणन से अवतरित 13
अगर धरा पर आप न आते।
जीव-जन्तु तब पनप न पाते।।14
न आते तो मरु रहती धरा।
आप से ही जगत हरा-भरा। 15
आप से जीव-जंतु में प्राण।
आप करते जग का कल्याण।16
आप मानव के मित्र घनिष्ठ।
मानव आपको माने इष्ट।। 17
लोगों को है अटूट विश्वास।
हर तरु पर है देव का वास।। 18
जल मिट्टी वायु के प्रदूषण।
इन दुष्टों का करते चूषण।। 19
विपदाओं से देते निजात।
रोक प्रकृति भयंकर आघात।।20
संतुलित रखते पर्यावरण।
शुद्ध करे आप वातावरण।। 21
भूस्खलन हो या मृदा कटाव।
आप रोक लेते जल बहाव ।। 22
आप देते हैं अन्न दाना ।
फल पत्ती पशुचारा खाना।23
पशु-पक्षी मनुज होते तृप्त।
आपकी उपयोगिता विस्तृत।। 24
असाध्य रोग से लोग आहत।
वनौषधि से आप दे राहत।।25
गृह में ब्याह श्राद्ध करे आर्य ।
आप बिना सब अधूरा कार्य।।26
पूजा पाठ यज्ञ हवन विविधा।
आपकी लकड़ी बने समिधा।27
जब पड़ोसी से हो लड़ाई।
लठ-डंडा से हाथ सफाई।। 28
बुढ़ापा में कठिन है चलना,
दगा देती जब उभय नयना । 29
वरिष्ठ को आप देते साथ ।
जब पैना-छड़ी उनके हाथ।। 30
जब पार करना हो जलधारा।
नौका बनकर दे सहारा । 31
जब भवन आलिशान बनाते।
जब लोग अपना घर सजाते।।32
चाहिए कुर्सी-टेबल मेज़।
दीवान पलंग चौकी सेज।। 33
खिड़की-चौखट किवाड़ पल्ला।
हल जुगाड़ बैलगाड़ी छल्ला।। 34
आपके गुण पर नर इतराते।
विभिन्न रूप दे घर चमकाते।। 35
हॉकी,क्रिकेट-विकेट बल्ला।
आपके बल पर ये जलजला।।36
गरीब के घर हो जब बनना।
आपही बनते बली धरना । 37
कड़ी धूप में आप दे छांव।
पशु-पक्षी मनुज सबको ठाँव।38
लोग बनाते खाना नाश्ते।
आप लकड़ी बन काम आते।।39
अर्थी अंतिम दाह संस्कार।
आप ही तो करते उद्धार।। 40
दोहा
आर्थिक रीढ़ सुधार में, बहुमूल्य योगदान ।
मनुज न कर सकता कभी, तरु का ऋण भुगतान ।।
वृक्ष कभी मत काटिए, स्वार्थ से वशीभूत।
ये हैं परहित हेतु ही, इनके लाभ अकूत।।
वृक्ष अत्यधिक रोपिए, इनका रखना ध्यान।
बन्द करें अब काटना, उचित मिले सम्मान।।
वृक्ष हमारी सांस हैं , सबका हैं विश्वास ।
नित पूजा हो पेड़ की, जिसमें देव निवास।।
इति
©®