तुम ही

तुम ही दीया तेल और तुम ही हो बाती
अगर जलोगे तुम तो दहकेगी ही छाती
तुम ही हो प्रेमिका स्वयं की, तुम ही लिखते
विरह अग्नि में तपकर अपने को ही पाती।
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तुम ही वेद पुराण कुरान, बाइबल तुम ही
तुम ही कल थे तुम्हीं आज,होगे कल तुम ही
तुम्हीं सृष्टि, स्रष्टा हो, तुम ही हो नर नारी
ध्याता ध्यान ध्येय हो तुम ही, केवल तुम ही।
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मंदिर मस्जिद चर्च तुम्हीं, तुम ही गुरुद्वारा
तुम जलचर थलचर नभचर, तुम ही जग सारा
शीत ग्रीष्म पावस तुम, तुम ही ऋतु परिवर्तन
तुम ही विजयोल्लास, तुम्हीं से जग है हारा।
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यह ही है अध्यात्म, इसे अन्तस में धारो
तुम ही देवदास हो, तुम ही अपनी पारो
तुम ही शरच्चन्द हो, तुम ही हो अरुणोदय
पहचानो अपने को, खुद को स्वयं पुकारो।
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सुनकर आर्त पुकार स्वयं ही दौड़ लगाओ
स्वयं द्रौपदी बनो, कृष्ण बन चीर बढ़ाओ
करो कृपा अविलम्ब स्वयं के ऊपर साथी
सिद्धि शिखर पर स्वयं पहुंच जग को पहुंचाओ
महेश चन्द्र त्रिपाठी