*कुंभमय होली (कुछ दोहे)*

कुंभमय होली (कुछ दोहे)
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1)
याद अभी भी आ रही, संगम की जलधार।
महाकुंभ के नाम है, होली अब की बार।।
2)
महाकुंभ का है चढ़ा, ऐसा गाढ़ा रंग।
अब भी मन को लग रहा, तन संगम के संग।।
3)
होली पर इस बार है, महाकुंभ की छाप।
मन प्रयाग में कर रहा, नर्तन अब भी आप।।
4)
तन-मन में अब भी बसी, महाकुंभ की धूम।
होली पर दिल कर रहा, चल प्रयाग में झूम।।
5)
मेला जैसे कुंभ का, मस्ती वाली चाल।
होली पर यों लग रहा, उड़ता हुआ गुलाल।।
6)
होली खेलें इस तरह, दहकाऍं यों आग।
जैसे अब भी चल रहा, अद्भुत कुंभ प्रयाग।।
7)
तीरथराज प्रयाग को, वंदन बारंबार।
होली पर आओ करें, पुनः कुंभ जयकार।।
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रचयिता: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश मोबाइल 9997615451