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19 Jan 2025 · 1 min read

ढेरों अधूरे ख्वाब

ढेरों अधूरे ख्वाब
संजो कर रख लेता हूँ
हर रोज़ सिरहाने अपने
मुक्कमल नहीं हुए तो क्या…
कुछ ज्यादा ही
कीमत चुकाई है मैंने इनकी

हिमांशु Kulshrestha

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