तिरंगा लहराता हुआ झंडा अपना अभिमान है।

खूब मनाओ तीज त्यौहार,
खूब बढ़ाओ अपने संस्कार,
ये संस्कृति ही अपनी जननी है,
भूलना न मातृ भूमि का प्यार।
दौलत शोहरत के चक्कर में,
सौदा न करना अपने संस्कृति से,
खूब पाया है प्यार जो तुमने,
विश्व में नहीं कोई ऐसा देश।
भारत के संतान हो प्यारे,
वेश भाषा मिट्टी न दूजा,
रूप सभी में एक ही झलके,
गंगा,यमुना,कावेरी और ब्रह्मपुत्र ।
जितने रंग घुले है मिट्टी में,
उतने धर्म बने इस धरती में,
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई,
जैन बुद्ध निराकार सब अपनाए।
जन मानस है इतना संयम,
वीर भूमि में न्यौछावर तन मन,
जो घोले विष इस हिंद में,
दब जाएंगे मातृभूमि के चरणों में।
यही हमारी पहचान है,
सिंह शीर्ष स्तंभ चार है,
महान सम्राट अशोक की लाट है,
गर्जना करता भारतीय निशान है।
चक्र विराजमान श्वेत पट पर,
चौबीस तीलियां नीली आकृति,
केसरिया,श्वेत और हरा ध्वज शान है,
तिरंगा लहराता हुआ झंडा अपना अभिमान है।
रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर।