स्त्री मन..

स्त्री मन..
तूल न दे कर हंँस देती हूँ, पर तकलीफ मुझे भी होती है,
बात भले ही सुन लेती हूँ, पर बार बार सुनकर
खीझ होती है,
सबकी परवाह करती हूँ, पर उसकी भी सीमा होती है,
खुद की परवाह नहीं करती हूँ, शायद यही गलती होती है।
–पूनम झा ‘प्रथमा’