*केरल यात्रा*

केरल यात्रा
28 मार्च से 31 मार्च 2025
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केरल के प्राचीन इतिहास को कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के भीतर दीवार पर एक बड़ी-सी पेंटिंग के रूप में बनाकर दर्शाया गया है। इस पेंटिंग के अर्थ को समझाने के लिए एक ओर मलयालम भाषा में तथा दूसरी ओर अंग्रेजी में संक्षेप में इसका वर्णन किया गया है। लिखा है कि प्राचीन काल में केरल में राजा बलि का शासन था। वह दानवीर और प्रजा का कल्याण करने वाले राजा थे। भगवान विष्णु ने बौने ब्राह्मण का रूप धरकर उनसे तीन पग भूमि मॉंगी। दानवीर राजा बलि ने उन्हें वह भूमि प्रदान कर दी। तीन पग भूमि में बौने ब्राह्मण ने विशाल रूप धारण करके संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया। राजा बलि को अपना राज्य छोड़ना पड़ा। लेकिन राजा बलि की दानशीलता केरलवासी कभी नहीं भूले। हर साल ऐसा माना जाता है कि राजा बलि अपनी प्रजा से मिलने के लिए केरल आते हैं और केरल-निवासी बड़े उत्साह के साथ कई दिन तक उनके स्वागत में ओणम नामक उत्सव मनाते हैं।
कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के दीवार-चित्रकला के केंद्र में राजा बलि हैं। उनके इर्द-गिर्द ओणम का उत्सव मनाते हुए केरलवासी उत्साह और आनंद में निमग्न होकर अपने राजा के स्वागत करते दिखाई पड़ते हैं। इस चित्र में रंगोली भी है। फूलों की खुशबू भी है। नृत्य, संगीत और वह मूल-कथा भी है जो केरल के राजा बलि की दानवीरता से जुड़ी हुई है। केरल के प्राचीन इतिहास और उस इतिहास की जीवंतता को चित्र और संक्षिप्त विचारों के प्रदर्शन से ज्यादा बेहतर तरीके से शायद ही समझाया जा सकता है। इससे पता चलता है कि केरल की जड़ें भारत के सनातन गौरव और उल्लास के साथ कितनी गहरी जुड़ी हुई हैं ।
केरल यात्रा के लिए 28 मार्च 2025 को हम रामपुर/मुरादाबाद से चलकर दो कारों में दिल्ली हवाई अड्डे पहुंचे। सुबह पॉंच बजे हमारा हवाई जहाज कोची के लिए रवाना हुआ और तीन घंटे में उसने हमें कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतार दिया।
कोची और कोचीन दोनों एक ही शहर के नाम हैं। आजादी मिलने के समय जो शहर कोचीन कहलाता था, इक्कीसवीं सदी में उसी का नाम परिवर्तित होकर अब कोची हो गया है। लेकिन अभी भी अनेक दुकानों पर हमें कोचीन नाम देखने को मिला। सरकारी और गैर-सरकारी दोनों क्रियाकलापों में यह दोनों नाम किसी न किसी रूप में प्रचलन में हैं। कोचीन के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक रेस्टोरेंट ने तो अपना नाम ही कोची-कोचीन प्रमुखता से लिख रखा है।
कोचीन भारत का एक पुराना बड़ा शहर रहा है। कोचीन की सड़कों पर महानगरीय आभा चारों ओर देखी जा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से निकलकर हम लोग दस-सीटर बस में सवार हुए और कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट की तरफ चल दिए। दस लोगों में मैं और मेरी पत्नी, दो पुत्र, दोनों पुत्रवधुऍं, एक पोता तथा तीन पोतियॉं थीं। हम लोग केरल घूमने के लिए आए थे।
कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट
हमारा ठहरने का इंतजाम कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट में था। वैसे तो कुमारकॉम पर्यटन स्थल केरल के जिला कोट्टायम में पड़ता है लेकिन हवाई सुविधा के आधार पर यह कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से ही सर्वाधिक निकट बैठता है। इसीलिए हम दिल्ली से हवाई उड़ान के द्वारा कोचीन आए। अब लगभग दो घंटे का बस का सफर था। स्पेशल बस हमने चार दिन के लिए ठहराई हुई थी। दो घंटे के बस के सफर से एक फायदा जरूर हुआ कि हमें कोचीन से कुमारकॉम तक के रास्ते में महानगरीय, नगरीय और अर्ध-नगरीय चित्रों को नजदीक से देखने का अवसर मिल गया। शहर और दुकानें तो पूरे भारत में शायद एक जैसी ही हो चुकी हैं, लेकिन फिर भी इस बात के लिए केरल की प्रशंसा करनी होगी कि ज्यादातर स्थान पर हमें अंग्रेजी के साथ-साथ मलयालम में लिखे हुए दुकानों के नाम भी देखने को मिले। कुछ बड़ी संख्या में ऐसी दुकानें भी थीं जहॉं केवल मलयालम में ही नाम लिखे थे। विभिन्न कार्यक्रमों की सूचना देने के लिए छोटे और बड़े होर्डिंग भी केवल मलयालम में ही लिखे हुए हमें स्थान-स्थान पर देखने को मिले। सरकारी कार्यालयों में मलयालम और अंग्रेजी का प्रयोग बोर्ड पर हमें देखने को मिला। सनातन धार्मिक गतिविधियों से जुड़े आयोजनों में बड़े-बड़े बोर्ड केवल मलयालम भाषा में लिखे हुए हमने देखे। यह सब प्रवृत्तियां मातृभाषा के प्रति केरल-वासियों के गहरे प्रेम को उजागर करती हैं। देखकर मन श्रद्धा से भर उठा।
कोचीन हवाई अड्डे से कुमारकॉम पर्यटन स्थल के दो घंटे के रास्ते में हमें सभी घर साफ-सुथरे और सजे हुए दिखाई दिए। यह आश्चर्यजनक था। ऐसा लगता था मानों घरों को किसी के स्वागत के लिए सजाकर रखा गया हो। ज्यादातर घरों के आगे पेड़-पौधे उगाए गए थे। खुला स्थान छोड़ने की प्रवृत्ति गृह-स्वामियों में हमारे देखने में आई।
केरल की पुरानी शैली में भवनों की छतें लाल रंग की ढलानदार हमें दिखाई दीं । कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा इसी शैली के भवनों में बना हुआ है। लाल रंग की छतें हैं। सभी छतें ढलानदार हैं। अलग-अलग प्रकार के डिजाइन भले ही हों लेकिन वह एक विशिष्ट संस्कृति का मानो उद्घोष कर रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा तो बड़ी संरचना होती है लेकिन साधारण घरों में भी इसी बनावट का परिचय हमें छतों की संरचना में देखने को मिला। लाल रंग की छतें या तो टीन की बनी हुई थीं या फिर उन पर सीमेंट का काम था। ऐसा प्रतीत होता था कि छतों की इन संरचना में कोचीन से कुमारकॉम तक एक गहरा लगाव है। हालांकि बहुत से नए मकान ढलानदार लाल छतों की विशेषता का अनुसरण करने से परहेज करते हुए भी हमें दिखे। यह सीधी सपाट छतों वाले मकान थे। यह बात तो निश्चित है कि मकान चाहे जैसे हों, उनमें सफाई और रंगाई-पुताई विशेष रूप से नजर आती थी।
हमारा गंतव्य कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट था। कुमारकॉम एक बड़ा पर्यटन स्थल है, जो केरल की सबसे बड़ी झील वेम्बनाड के किनारे विकसित हुआ है। गुणवत्ता वाले दर्जनों रिसोर्ट यहां देखे जा सकते हैं । अनेक फाइव स्टार रिजॉर्ट कुमारकॉम पर्यटन स्थल में हैं । हमारा रिजॉर्ट भी उनमें से एक है । सड़क मार्ग पर एक लाइन में एक के बाद दूसरे रिजॉर्ट बने हुए हैं। कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट का नामकरण एक तो स्थान के नाम पर है। दूसरा झील अर्थात लेक के नाम पर है और तीसरा ठहरने की विशिष्ट प्राकृतिक और खुली आरामदायक आधुनिक व्यवस्था के कारण है। तमाम पर्यटन-स्थलों पर आजकल बंद इमारत के बंद कमरों के स्थान पर खुली प्राकृतिक छत के बीच में बड़े-बड़े मकाननुमा कमरों को वरीयता दी जा रही है। यह कमरे होते हुए भी कमरे नहीं हैं। मकान हैं, विला हैं ।आधुनिक झोपड़ी हैं। जंगल के बीच में मंगल हैं ।
कुमारकॉम लेक रिसोर्ट में सर्वत्र लकड़ी का कार्य भवन-संरचना में प्रयोग में लाया गया है। रिसेप्शन हॉल पूरी तरह लकड़ी का बना हुआ है। भोजन कक्ष भी लकड़ी का है। यात्रियों के ठहरने के लिए जो विला/कमरा हमें मिला, उसमें भी भीतरी संरचना लकड़ी की थी। पूरी छत ढलानदार शैली में लकड़ी की बनी हुई थी। दरवाजों की विशेषता यह थी कि उसके अंदर कुंडी लगाने की व्यवस्था भी प्राचीन शैली के लकड़ी के टुकड़ों से की गई थी। दरवाजे को आपस में लकड़ी फॅंसाकर भीतर से बंद करने का अनूठा इंतजाम रिजॉर्ट संचालकों ने किया हुआ था। दरवाजे के बाहर पीतल के डॅंडेलों को बंद करके पीतल की भारी चाबी से इतना हल्का घुमाना पड़ता था कि लगता ही नहीं था कि चाबी लग गई है।
पूरे रिजॉर्ट में झील का पानी नहर के रूप में फैला हुआ था। नहर के ऊपर चलकर जाने के लिए लकड़ी के पुल स्थान-स्थान पर रिसोर्ट की शोभा में चार च,द लगा रहे थे। पुराने जमाने की बैलगाड़ियों में प्रयुक्त ढकी हुई गोल गाड़ी शोपीस के रूप में हमें देखने को मिली। पक्षी निर्भयता पूर्वक रिसोर्ट में विचरण करते हुए मिले। कौवे तो बहुत ही निडर थे। ऐसा लगता था कि वह मनुष्यों के बीच में रहने की कला में पारंगत हो चुके हैं । सबके पास आकर बैठ जाना और बिना डरे बैठे रहना इन कौवों का स्वभाव था।
रिजॉर्ट के अंतिम छोर पर इसी झील के किनारे हमें योगाचार्य जी के साथ प्रातः काल योग करने का अवसर मिला। योग-शिक्षक यात्रियों के लिए रिसोर्ट द्वारा नि:शुल्क नियुक्त थे। झील की पृष्ठभूमि में योग का कार्यक्रम अपने आप में दिव्य बन गया। झील से बिल्कुल लगा हुआ ही रिसोर्ट का स्विमिंग पूल था। हमें तैरना तो नहीं आता था लेकिन हमने स्विमिंग पूल में डुबकी अवश्य लगाई। स्विमिंग पूल के साफ-सुथरे पारदर्शी जल में स्नान करने का अपना अलग ही मजा है। फिर जब हम स्विमिंग पूल में हों और हमारी आंखों के सामने दूर-दूर तक फैली हुई झील हो, तब तो इस रोमांच के क्या कहने !
यात्रियों के मनोरंजन के लिए रिसोर्ट में जालीदार झूले पर लेट कर आनंद लेने का इंतजाम भी किया हुआ था। हमने इसका भी मजा लिया। बच्चों के साथ टेबल टेनिस और कैरम बोर्ड भी खेला। मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि भी यात्रियों को सीखने का इंतजाम एक कमरे में रिसोर्ट में दिनभर के लिए किया गया था। हमने भी मिट्टी के कलाकार से डिजाइनदार दीपक बनाने की कला सीखी।
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मलयालम कैलेंडर
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कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट में एक विशेषता हमने यह भी अच्छी देखी कि इनके भीतर मलयालम भाषा के प्रति अपार प्रेम है। मलयालम कैलेंडर का वर्ष, माह और तिथि प्रतिदिन यह दीवार पर लिखकर रखते हैं। ताकि सबको यह ज्ञात रहे कि मलयालम कैलेंडर क्या होता है? और इसके अनुसार आज की काल-गणना क्या है।
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हिंदी का अखबार नदारत
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रिसोर्ट में मलयालम और अंग्रेजी भाषाओं के कई अखबार आते थे। जब हमने रिसोर्ट में रहना शुरू किया तो रिसेप्शन पर हमने हिंदी के अखबार की मांग की। हमने कहा कि केरल की विविध गतिविधियों को हम हिंदी समाचार-पत्रों के माध्यम से जानने के इच्छुक हैं। स्वागत-कक्ष में विराजमान महिला अधिकारी ने अगले दिन हमें बताया कि कोशिश करने पर भी हिंदी का समाचार पत्र यहां उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
केरल में रिसोर्ट के भीतर तथा बाजारों में दुकानों पर थोड़ी-बहुत हिंदी प्रायः सभी लोग समझ लेते हैं।
कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट को भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय से जो ‘फाइव स्टार’ श्रेणी का प्रमाण पत्र मिला है, वह भी अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी भाषा में लिखित है। यह हिंदी के प्रति रिसोर्ट के प्रेम को दर्शाता है।
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पति-पत्नी की पारंपरिक वेशभूषा
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केरल में पति-पत्नी के बीच गहरे आत्मीय संबंधों की एक झलक हमें लौटते समय कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर देखने में आई। लगभग पिचहत्तर वर्ष की आयु के एक दंपति व्हीलचेयर पर बैठे थे। पति को सुनाई बिल्कुल नहीं देता था। पत्नी ही यात्रा में उनके समस्त सहायता-कार्य कर रही थीं। दोनों की वेशभूषा परंपरागत केरलवासियों की थी। सफेद धोती पर सुनहरी किनारा पुरुष पहने हुए थे। रंगीन साड़ी महिला पहने हुए थीं। माथे पर चौड़ा तिलक-चंदन सुशोभित था। दंपति एर्नाकुलम के किसी भीतरी हिस्से में रहते हैं।
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मलयालम फिल्मों की लोकप्रियता
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केरल में मोहनलाल अत्यंत लोकप्रिय मलयालम फिल्म सुपरस्टार हैं -यह बात हमें तब पता चली जब हमने कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट में शाम के समय चाय पीते समय कुछ पुरानी मलयालम फिल्मों के पोस्टर पेड़ ७के पास रखे हुए देखे। हमने चाय और पकौड़ी बनाने वाले कारीगर से मालूम किया तो पता चला कि यह मलयालम फिल्मों के जनप्रिय सुपरस्टार मोहनलाल की फिल्मों के चित्र हैं।
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नौका से झील की सैर
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नौका से झील की सैर करने का आनंद अपने आप में दिव्य था। दूर-दूर तक फैली हुई झील के मध्य में बोट से विचरण के सुख को संगीत के कार्यक्रम ने दुगना कर दिया। एक सज्जन तबला बजा रहे थे और दूसरे सज्जन बांसुरी पर हिंदी फिल्मों की धुनें प्रस्तुत कर रहे थे। दोनों मंजे हुए कलाकार थे। झील में नौका पर घूमना-फिरना और संगीत सुनना- इन सब ने पर्यटन के आनंद को चार चांद लगा दिए।
झील में केवल पानी को निहारना ही पर्याप्त नहीं होता। झील के तट पर जो रिजॉर्ट बने हुए हैं, उनको निकट से देखने का भी अपना महत्व होता है।
इससे भी बढ़कर नाव में घूमने का मजा तब है, जब हम झीलों की पतली-पतली नहरों तक जाएं और उसके दोनों किनारों पर जो मकान बने हुए हैं और जिसमें लोग रह रहे हैं; उन पर भी एक नजर डालें।
एक दिन हमने सुबह के समय ऐसा ही किया। तमाम रिजॉर्ट इस श्रेष्ठ पर्यटन स्थल की जिस प्रकार से शोभा बढ़ा रहे हैं, उनके दर्शन करने का सौभाग्य भी हमें मिला। आलीशान कोठियॉं भी देखने में आईं। ऐसे मकान भी दिखे जो मध्यम वर्ग के थे। कुछ मकान अर्ध विकसित अवस्था में थे। उनमें रहने वाले लोग झील में दो-तीन पैड़ी उतरकर बर्तन धोते हुए भी हमें दिखाई दिए। एक स्कूल भी बना हुआ था। एक चर्च भी था। मोटरसाइकिल और कारें भी लोगों के घरों पर मौजूद दिखीं। इसका मतलब है कि कुमार कॉम एक अच्छा-खासा आबादी के रहने का शहर है। पर्यटन की दृष्टि से इसकी ख्याति है। लेकिन किसी न किसी रूप से जो लोग यहां के जनजीवन से संबंधित हैं, उनकी गतिविधियां भी इस शहर के साथ जुड़ी हुई हैं । झील में कमल के फूल-जैसे दिखने वाले पुष्प भी हमें काफी संख्या में दिखे। बगुले भी थे, जिन्हें मछली खाते हुए हमने देखा। झील शांत थी। हवा की लहरों अथवा मोटर बोट के कारण ही झील में लहरें उठ रही थीं।
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फोर्ट कोची
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फोर्ट कोची एक आधुनिक शहर कहा जा सकता है । इक्का-दुक्का स्थानों पर हमने इसे फोर्ट कोचीन लिखा हुआ भी पाया। इसकी गलियॉं और सड़कें अत्यंत आकर्षक रंगीन टाइलों से सजाई हुई थीं । हर मोड़ पर नामकरण का एक नया पत्थर हमारा स्वागत करने के लिए तैयार मिला। एक सड़क का नाम वास्कोडिगामा के नाम पर था। एक सड़क प्रिंसेस रोड थी। इन सड़कों के दोनों तरफ जो दुकान और रेस्टोरेंट थे, उनकी भवन संरचना भी बहुत सुंदर थी तथा उनमें सफाई भी देखने योग्य थी। सड़क पर न कोई कूड़ा फेंक रहा था, न कोई कूड़ा कहीं दिखाई देता था।
एक रेस्टोरेंट में हमने कॉफी पी। कुछ जलपान किया। यहां पर एक विशेषता यह अच्छी लगी कि मूर्ति कला के कुछ आधुनिक प्रयोग रेस्टोरेंट के एक कोने की शोभा बढ़ा रहे थे। व्यक्ति के दिमाग में कितना कुछ चल रहा है , यह इन कलाकृतियों से व्यक्त हो रहा था। रेस्टोरेंट के संचालकों ने कलाकार का नाम ‘अभिजीत’ और उसका चिंतन एक कागज पर लिखकर अंकित किया हुआ था। कला के प्रति यह सम्मान का भाव फोर्ट कोची की संस्कृति की विशेषता कही जा सकती है।
फोर्ट कोची में एक सड़क पर हमने व्हेल मछली को बचाने की मुहिम से संबंधित एक दीवार-पेंटिंग देखी। यह अच्छा कार्य था।
फोर्ट कोची में एक अन्य स्थान पर हमने नारियल की ताजा बनी आइसक्रीम का स्वाद चखा। इसे नारियल के भीतर रखकर परोसा गया था। नारियल के पानी को एक अलग गिलास में हमें पीने के लिए दिया गया था। नारियल के भीतर नारियल की बनी हुई ताजा आइसक्रीम का सेवन बढ़िया अनुभव रहा।
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फोर्ट कोची में समुद्र तट
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फोर्ट कोची में समुद्र तट है। जब हम फोर्ट कोची के समुद्र तट पर गए, तो हमारे सामने पानी के तीन-चार बड़े-बड़े जहाज सामने से गुजरे। इन पर सामान लदा हुआ था। काफी देर तक हम समुद्र के तट पर खड़े रहकर लहरों के उतार-चढ़ाव को देखते रहे। हमने देखा कि एक लहर आती है और जब तक वह हमारे पास तक आती है; उससे पहले ही दूसरी और तीसरी लहर कहीं दूर से चलना आरंभ कर देती है। इस अनवरत क्रम को इस सृष्टि में कब से संपादित किया जा रहा है, भला कौन बता सकता है ?
समुद्र का तट सृष्टि की विराटता का एक ऐसा द्वार हमारे सामने खोलता है कि हम गहरी सोच में पड़ जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ।
खैर, समुद्र के तट से दस-बारह फीट ऊंची सड़क है। सड़क के दोनों और ठेले वाले सामान बेच रहे हैं। पानी की बोतल , कोल्ड ड्रिंक, गरम-गरम उबला हुआ भुट्टा, भेलपुरी, गोलगप्पे- बस यों समझ लीजिए कि मेला यहां लगा हुआ था। समुद्र तट पर आकाश में मॅंडराते हुए कौवोंं की भरमार है। इसी से मिलता-जुलता वातावरण पैदा करने के लिए ही मानो जो पतंगे बेची जा रही थीं और उड़ाई जा रही थीं, उन पर चील की आकृति बनी हुई थी। अंधेरा होने से पहले हम समुद्र तट से वापस आ गए।
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कथकली मंडपम् में कथकली नृत्य
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केरल यात्रा का हमारा महत्वपूर्ण पड़ाव कथकली केंद्र में कथकली नृत्य देखना रहा। यह फोर्ट कोची में स्थित है। मुख्य सड़क पर एक पुरानी पतली गली के भीतर जाकर यह सेंटर 1994 से काम कर रहा है।
इसके संचालक अथवा मुख्य कर्ताधर्ता सुचेंद्र जी हैं। आयु लगभग पैंसठ वर्ष। भारी शरीर लेकिन अत्यंत सक्रिय। परम विद्वान। नृत्य, संगीत तथा शास्त्रों का ज्ञान आपकी रग-रग में बसा है। कथकली नृत्य में जो गायन मंच पर प्रस्तुत किया जाता है वह सुचेंद्र जी ने ही प्रस्तुत किया। आपकी आवाज में गंभीरता है। शंख भी बहुत अच्छा बजाया। आप ऑलराउंडर हैं। कथकली सेंटर को सरकार से कोई मदद नहीं मिलती लेकिन फिर भी सुचेंद्र जी ने बताया कि आप लगन-आस्था के कारण प्रतिदिन कथकली का शो दर्शकों के लिए प्रस्तुत करते हैं। हमारे शो में भी पचास-साठ व्यक्ति तो रहे ही होंगे। हाल की क्षमता एक सौ से कुछ अधिक थी।
कथकली की प्रस्तुति से पूर्व सुचेंद्र जी ने बताया कि यह नरकासुर वध का एक प्रसंग है। एक छपा हुआ पंफलेट भी आपने दर्शकों को उपलब्ध कराया। जिसमें यह बताया गया था कि नरकासुर की बहन स्वर्ग की स्त्रियों को अपहरण करके नरकासुर के लिए लाना चाहती थी। वह स्वर्ग गई किंतु इंद्र के पुत्र के साथ प्रेम में पड़ गई। जब असफल हुई तो उसने अपना असली रूप दिखाया। जो एक भयावह राक्षसी का था। कथकली के प्रोग्राम में हमने नरकासुर की बहन नक्रथुंडी को इस मौके पर बिखरे हुए बाल और भयंकर नुकीले दांतों वाली एक राक्षसी के रूप में मंच पर देखा। उसके नाक और कान इंद्र के पुत्र जयंत ने हमारे सामने तलवार से काटे थे।
कथकली को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की कथा के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया। संभवत गायन में संस्कृत और मलयालम का मिश्रण चल रहा था। प्रारंभ में हमारे सामने कथकली के मुख्य पात्र का मेकअप हुआ। उसके बाद यह नृत्य आरंभ हुआ। कथकली में नृत्य कम, अभिनय ज्यादा था। केवल दो पात्र हैं। महिला पात्र नक्रथुंडी चेहरे के हाव-भाव और आंखों की पुतलियां को घुमाने के माध्यम से अपनी बात कहती है। उसकी योजना इंद्र के पुत्र को रिझाने की है। अतः वह अत्यंत शांत, मधुर और सौम्य मुखमुद्रा में कथकली का अपना अभिनय करती है। दूसरे मुख्य पात्र के चेहरे पर कई रंगों से सजावट की जाती है। संचालक महोदय ने बताया कि यह सभी रंग प्राकृतिक हैं ।कथकली नृत्य के समय शंख वादन और ड्रम बजाने का कार्य भी हुआ। मंजीरे भी बजे। संचालक महोदय ने बताया कि कथकली की कथा भागवत पुराण से ली गई है। कथकली नृत्य के समय हमने महसूस किया कि नृत्यकर्ताओं का पूरा पैर जमीन पर ‘थप’ की आवाज के साथ पड़ता है। पुरुष पात्र हाथ में तलवार लेकर अंत में अपने अभिनय और नृत्य कौशल का परिचय देता है। इसी तलवार से वह नरकासुर की बहन के नाक-कान काटता है। कथकली नृत्य का समापन संचालक सुचेंद्र जी द्वारा सर्वमंगल की कामना से हुआ। जब तक कथकली नृत्य चला, ऐसा लगता रहा मानो किसी मंदिर में हम ईश्वर भक्ति और आराधना के किसी कार्यक्रम का हिस्सा बने हुए हैं।
नरकासुर वध की कथा का प्रसंग केरल की विशेषता है। इससे केरल में जाकर जुड़ना तथा सही संदर्भ में कथकली को समझ पाना हमारा सौभाग्य ही कहा जा सकता है। कथकली नृत्य में महिला पात्र न केवल प्रसंग का चित्रण करने में समर्थ रही, अपितु विभिन्न प्रकार के प्रयोग भी आपने संपादित किये।
एक स्थान पर नायिका ने विवाह के समय दोनों हाथों से फूलों की माला लेकर वर को जयमाला पहनाने का अभिनय प्रस्तुत किया । इस प्रकार के अभिनय से जहां एक ओर अभिनय कला पुष्ट हो रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति में विवाह के समय कन्या द्वारा वर को जयमाला पहनाने की परंपरागत रीति की स्थापना भी हो रही है।
महिला पात्र ने मॉं का रोल भी बहुत सुंदर किया। विभिन्न प्रकार की मुखमुद्राओं से करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, शांत आदि रूपों को कलाकार ने कथकली के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।
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मोहिनीअट्टम
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केरल का ही एक अन्य प्रसिद्ध नृत्य मोहिनीअट्टम भी कथकली सेंटर में हमने देखा। इसमें नृत्यांगना सफेद साड़ी पहने हुए थीं। जिस पर सुनहरी पीली किनारी खूब चमक रही थी। मोहिनीअट्टम के प्रसंग को संचालक महोदय ने भगवान विष्णु के मोहिनी रूप में प्रकट होने से संबंधित बताया। यह घटना समुद्र मंथन के समय भी हुई थी और भस्मासुर की कथा से भी इसका संबंध है। मोहिनीअट्टम में नृत्य और अभिनय दोनों का सुंदर समन्वय है। केरल के प्राचीन राजाओं के द्वारा मोहिनीअट्टम कला का संरक्षण संवर्धन हुआ। इन्हीं श्रेष्ठ राजाओं के द्वारा संस्कृत और मलयालम के मिश्रण से मोहिनीअट्टम के गीतों की रचना भी हुई। मोहिनीअट्टम और उसके साथ जुड़ी भारतीय संस्कृति की गौरवशाली कथाएं केरल की उत्सवधर्मिता का आज भी एक अभिन्न अंग है। मोहिनीअट्टम को केरल के एक कथकली सेंटर में कला को समर्पित ऑडिटोरियम में बैठकर देखना जीवन की एक बड़ी उपलब्धि कही जाएगी।
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भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी
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कथकली सेंटर में हमने सिर्फ कथकली और मोहिनीअट्टम ही नहीं देखा। भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी नृत्य भी हमारे सामने प्रस्तुत किया गया।
भरतनाट्यम तमिलनाडु का नृत्य है। भरतनाट्यम की जो प्रस्तुति हमने देखी, उसमें देवी दुर्गा की उपासना है। इसमें दुर्गा के उमा, पार्वती, कात्यायनी आदि विविध नामों का वर्णन है। यह एक भक्तिमूलक प्रस्तुति है। इसमें संदेह नहीं कि भरतनाट्यम के माध्यम से दुर्गा-स्तुति का भाव दर्शकों तक पहुंचाने में नृत्यांगना सफल रहीं।
कुचिपुड़ी नृत्य भी कथकली सेंटर में प्रस्तुत किया गया। यह आंध्र प्रदेश का नृत्य है। इसमें यशोदा मॉं और भगवान कृष्ण- इन दोनों की विविध लीलाओं को नृत्य के माध्यम से कलाकार द्वारा प्रस्तुति दी गई।
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कलारीपट्टम
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कथकली सेंटर में एक कलारीपट्टम अथवा कलरिपयट्टू का कार्यक्रम भी हमने देखा। इसे कलारी भी कहा जाता है। इसको ‘दुनिया-भर में मार्शल आर्ट की जननी’ कहा जाता है। कलारी केरल की कला है।
हमने देखा कि इसमें तलवार और ढाल का प्रयोग करके दो योद्धा आपस में घमासान युद्ध करते हैं।
इसमें हमने एक योद्धा को हाथ में चाकू लेकर दूसरे योद्धा पर वार करते हुए भी देखा। हमें बताया गया कि यह चाकू असली है। अगर लग जाए तो अत्यंत घातक सिद्ध होता है। लाठियॉं हाथ में लेकर घुमाते हुए सुंदर प्रदर्शन भी इसमें हमारे सामने हुए।
सीनियर सिटीजन की श्रेणी में आ चुके कथकली सेंटर के संचालक सुचेंद्र जी ने भी लाठी हाथ में लेकर अपने दमखम मंच पर प्रस्तुत किये । मुश्किल से दस साल का एक बालक भी हाथ में लाठी लेकर मार्शल आर्ट की अपनी इस कला को निपुणता से प्रस्तुत कर रहा था। चाकू और तलवार के अलावा हंटर अथवा चाबुक से मिलता-जुलता एक हथियार भी चला कर मंच पर दर्शकों को दिखाया गया। इसको अत्यंत घातक हथियार कहा गया। इसका लग जाना अत्यंत खतरनाक रहता है।
मार्शल आर्ट का संबंध आत्मरक्षा से भी है। इस दृष्टि से कलारी के कलाकारों ने दर्शकों को भी मार्शल आर्ट के कुछ सूत्र समझाने के लिए मंच पर बुलाया। हमारे पौत्र रेयांश अग्रवाल और पौत्री रिआ अग्रवाल ने जिनकी आयु छह वर्ष है, मंच पर जाकर आत्मरक्षा के कुछ गुर सीखे।
कुमारकॉम लेक रिजॉर्ट में तीन दिन और तीन रातों का यह ठहरना केरल को जानने-समझने का एक अच्छा मौका साबित हुआ। 31 मार्च की सुबह नौ बजे हमारे विमान ने कोचीन हवाई अड्डे से दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी। यह केवल परिवार के दस सदस्यों का एक साथ घूमने-फिरने का कार्यक्रम मात्र नहीं रहा। यह केरल के महान शासक राजा बलि की दानवीरता और उनकी स्मृति में केरल की उत्सवधर्मिता के साथ जुड़ने का आयोजन भी बन गया। कथकली की नृत्य और अभिनय-कला के सम्मिश्रण से नरकासुर वध के प्रसंग का मूल भाव भी हमें जानने को मिला। मोहिनीअट्टम और कलारीपट्टम (मार्शल आर्ट की सबसे पुरानी कला) को भी हमें मंच पर फोर्ट कोची में देखने का शुभ अवसर मिला। महान कलाकार सुचेंद्र जी से निकटता स्थापित हुई। यह सब बड़ी उपलब्धियॉं हैं।
केरल को प्रणाम।
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लेखक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451