*सोलह वर्ष सेवा के*

उद्यान की माटी से जुड़कर,
बीत गए ये सोलह साल,
हरियाली को संजोते आए,
नए ख्वाबों के साथ हर हाल।
फूलों की खुशबू संग आई,
मेहनत की ये सौगात,
हर पौधा, हर नन्हीं कली,
जैसे अपनी हो बात।
धरती को संवारा हर पल,
हरी चादर से ढका,
नए पेड़, नई उमंगें,
हर मौसम में रचा-बसा।
सूरज की किरणें कहतीं,
तुम्हारा श्रम रंग लाएगा,
जो बीज लगाए मन से,
वो हरियाली बन मुस्काएगा।
सोलह वर्षों की इस यात्रा में,
खुशियों के फूल खिले,
उद्यान की गोद में हमने,
सपने सहेजे और मिले।