“समय”

“समय”
कुछ अधूरे स्वप्न, क्यूँकर,
हम बिलखते ही गए।
नित-नये अरमान पर,
दिल मेँ मचलते ही गए।।
यह मिले, खोऊँ न वह,
ज़र-माल रटते ही गए।
ख़्वाहिशों के भँवर मेँ,
प्रतिपल थे फँसते ही गए।।
ज्ञान का सागर वृहत,
साहिल पे तकते ही रहे।
हम निपट अज्ञान का पर,
दम्भ भरते ही गए।।
शुष्क अधरों को लिये,
तृष्णा को सहते ही गए।
बूँद की “आशा” मेँ,
सहरा मेँ भटकते ही गए।।
आज, कल, परसों पे,
टालमटोल करते ही गए।
शाश्वत है समय, पर,
हम सब गुज़रते ही गए..!