अब्राहमिक प्रभाव से ग्रस्त हमारे अधिकांश शिक्षक और धर्माचार्य (Most of our teachers and religious leaders suffer from Abrahamic influence)

हमारे आजकल के कथाकार,संत, योगाचार्य,स्वामी, संन्यासी आदि लोगों को कहते नहीं थकते हैं कि गंगा स्नान, महाकुम्भ स्नान, ब्रह्मसरोवर स्नान, दान, हवन आदि करने करवाने से मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी!पिछले सात आठ दशकों के दौरान पैदा हुये तथाकथित नकली भगवान्, संत, कथाकार और जगत् गुरु आदि तो पूरा दावा करके नामदान, माला, दीक्षा आदि दे रहे हैं कि इससे उनके सभी बुरे कर्म समाप्त हो जायेंगे तथा सीधे ही स्वर्ग, मुक्ति, सचखंड, मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी! वेद से लेकर उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, रामायण, महाभारत आदि कोई भी हमारा शास्त्र यह नहीं कहता है कि बिना कर्मों का भोग किये कर्मों का प्रभाव समाप्त हो जायेगा! किये कर्मों का फल मिलना अवश्यंभावी है! लगता है कि हमारे सनातनी गुरुओं, कथाकारों, संतों, महामंडलेश्वरों और शंकराचार्यो पर भी यहुदी, ईसाईयत और इस्लाम का कुप्रभाव पड़ गया है! उपरोक्त तीन सैमेटिक अब्राहमिक मजहबों में क्षमायाचना करने पर बिना भोग किये ही कर्मों का प्रभाव क्षीण होना माना गया है! हमारे सनातन धर्म और संस्कृति में तो कहा गया है-
नाभुक्तं क्षीयते कर्म, कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं, कृतं कर्म शुभाशुभम् ।। (ब्रह्मवैवर्त पुराण,17/37)
अर्थात् बिना भोगे करोड़ों कल्प वर्षों में भी कर्म का फल क्षीण नहीं होता। निश्चित रूप से अपने किये हुए शुभ-अशुभ कर्मों का फल मनुष्य को अवश्य ही भोगना पड़ता है।
यथा धेनु सहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्। एवं पूर्व कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति।!!
(महाभारत,अनुशासन पर्व, अध्याय 7)
अर्थात् जैसे हजारों गायों में बछड़ा अपनी मां को पहचान लेता है, वैसे ही पूर्व में किया हुआ कर्म अपने कर्त्ता को ढूंढ़ लेता है।
वैसे यह कहना बिलकुल सही है कि व्यावहारिक दर्शनशास्त्र का जन्म सदैव सुख और दुख की अतियों पर पहुंचे हुये कर्ममार्गी मेहनतकश लोग ही करते हैं!फुर्सत में सदैव पेट भरे हुये,निठल्ले, शोषक और आलसी लोग ही सोच -विचार करते हैं!ऐसे लोगों की फिलासफी सदैव अव्यवहारिक होती है!एकतरफा भोगी व्यक्ति दिन रात अनैतिक, अधार्मिक कर्मों को करके उनके फल को बिना भोगे ही संसार में मजे करने की फिलासफी को प्रधानता देते आये हैं! यानि कर्मों के करने में भी आजादी और कर्मों के फल को भोगने में भी आजादी! श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देने वाले ज्ञानानंद, गीतानंद आदि भी इसी अब्राहमिक सीख का दुष्प्रचार कर रहे हैं कि हमारे चेला चेली बन जाओ, तुम्हारे सभी पाप कर्म समाप्त हो जायेंगे! लेकिन भगवान् श्रीकृष्ण तो कहते हैं कि हमारा अधिकार कर्म करने में, फल भोगने में नहीं! देखिये-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन!
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो…!!
(श्रीमद्भगवद्गीता, 2/47)
ये तथाकथित आजकल के गुरु अपना व्यापार चलाने के लिये स्वयं ही सनातन धर्म और संस्कृति का विनाश करने पर तुले हुये हैं!सनातनियों को यहुदी, ईसाईयत और इस्लाम का भय दिखलाकर चेला- चेलियों बढाना ही इनका लक्ष्य रह गया है!बहुसंख्यक सनातनियों को इतना भीरु बना दिया है कि वो शायद किसी भी आकस्मिक खतरे का सामना नहीं कर पायेगा!सत्ता दिन रात उसको भयभीत करने का काम कर रही है! सनातनी भयभीत होकर ही तो सत्ता को मतदान करेगा! भयभीत सनातनियों के सामने खुद को तारणहार के रूप में प्रस्तुत करना सत्ता का ही रचाया हुआ घटिया खेल है! अन्यथा सत्ता ने सनातनियों के हित में कोई काम नहीं किया है, जिससे प्रभावित होकर वह उसको बार -बार सत्ता प्रदान करता रहे! बस, सनातनियों के भीतर ईसाईयत, इस्लाम आदि का भय भर दिया गया है!भयभीत सनातनियों के सामने इन ढोंगियों को मतदान करने के सिवाय को रास्ता बचता नहीं है! सनातनियों को पहले 700 वर्षों तक मुगलों ने लूटा, 173 वर्षों तक अंग्रेजों ने लूटा, आजादी के पश्चात् 50 वर्षों तक इधर उधर होते रहे हैं! और अब अपने आपको सनातनियों का हितैषी कहने वाले ही सनातनियों को लूट रहे हैं!यह सनातनियों पर अब्राहमिक दुष्प्रभाव के कारण हो रहा है! कोई सत्य बोले या आवाज उठाये या प्रश्न करे तो सत्ता द्वारा उसको खामोश कर दिया जायेगा!सनातन धर्म, संस्कृति, अध्यात्म, दर्शनशास्त्र, नैतिकता और योग साधना आदि से किसी को कोई लेना -देना नहीं है!
अब्राहमिक दुष्प्रभाव के कारण हालात यह हो गये हैं कि अगर तुम सफल नहीं हो, तो दुनिया में तुम्हारा कोई भी नहीं है! दुनियावी लोग सिर्फ सफल लोगों के पीछे- पीछे जी -हुजूरी करते हुये घूमते हैं! असफल लोगों को कोई भी नहीं पूछता है! संसार में सिर्फ सफल लोगों को ही सम्मान मिलता है! असफल लोगों को सदैव हरेक कदम पर उपेक्षा, प्रताड़ना और अपमान का सामना करना पडता है! संसार की यही रीति नीति है!
‘न्याय’ सत्य तक पहुंचने के लिये होता है, न कि किसी की हार या जीत के लिये!पक्ष या विपक्ष की हार या जीत सत्य का उद्देश्य नहीं होता है! सत्य निष्पक्ष होता है! निष्पक्ष कभी भी पक्ष या विपक्ष का समर्थक या विरोधी नहीं होता है! निष्पक्ष तो पक्ष और विपक्ष दोनों को ही अपने में समाहित करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है! वास्तव में सत्य पक्ष या विपक्ष में न होकर पक्ष और विपक्ष का समर्थन करने वालों को एक साथ ले आकर निष्पक्ष होता है!सत्य का किसी से कोई झगड़ा नहीं होता है! सत्य सदैव विरोधियों को भी अपने साथ लाकर सत्पथ को प्रशस्त करता है!
अच्छा,सत्यनिष्ठ और तार्किक व्यक्ति सदैव दुखी और सत्ता द्वारा प्रताड़ित रहा है, आज भी दुखी और प्रताड़ित है तथा लग रहा है कि भविष्य में भी दुखी और प्रताड़ित ही रहेगा!इसका कोई भी विकल्प नहीं है! पिछली कई सदियों से संसार में धर्मसत्ता,धनसत्ता, जनसत्ता और राजसत्ता भले,अच्छे और तार्किक व्यक्ति के साथ शायद ही कभी खडी रही हो!भला, सही और तार्किक व्यक्ति सदैव उपरोक्त चार प्रकार की सत्ताओं के आंखों की किरकिरी बना रहा है! उपरोक्त चार प्रकार की सत्ताओं ने कभी भी भले, अच्छे और तार्किक व्यक्ति को सम्मान नही दिया है!महर्षि दयानंद, ओशो तथा राजीव भाई दीक्षित इसके ताजा उदाहरण हैं!
गुरुडम का इतना प्रचलन हो गया है कि हर गाँव,कस्बे और शहर में शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, भगवान् और जगतगुरु पैदा हो रहे हैं!जिसको देखो वही मनमानी उपाधियाँ लगाकर घूम रहा है!महिमामंडन के लिये हरेक के साथ लाखों की भीड मौजूद होती है! नैगेटिव निर्धारित करके ब्राडिंग के जरिये एक बलात्कारी को संत बना दिया जाता है,एक शोषक उद्योगपति को गरीबों का तारणहार बना दिया जाता है तथा एक लूटेरे नेता को भगवान् की तरह पूजा करने योग्य बना दिया जाता है!कुछ दशकों से एआई तथा इसके एडवांस वर्जन की नई तकनीकों के जरिये गोबरगणेश को प्रतिभाशाली और प्रतिभाशाली को गोबरप्रसाद सिद्ध करने के प्रयास बहुतायत से हो रहे हैं!
सनातन धर्म और संस्कृति में यह दुष्प्रभाव अब्राहमिक मजहबों से आयातित है!हमारे धर्माचार्यों को इतना भी मालूम नहीं है कि इससे सनातन धर्म और संस्कृति का ही नुकसान हो रहा है!इस तरह से तो सनातन धर्म और संस्कृति संसार से लुप्त ही हो जायेंगे!
और इस तरह का नुकसान करने वाले लोग ही अपने आपको सनातन धर्म और संस्कृति का सबसे बड़ा हितैषी कह रहे हैं!इससे बड़ा अन्य मजाक क्या हो सकता है?
महर्षि मनु ने आचरण की महत्ता को बतलाते हुये कहा है-
एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम्!
सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहु: परम्!!
अर्थात् किसी व्यक्ति का आचरण ही उसे धार्मिक बनाता है! सभी प्रकार के तप का मूल आधार श्रेष्ठ आचरण ही है!
लेकिन यह आचरण की पवित्रता दुर्लभ हो गई है!कुछ भी गलत या अधार्मिक या अनैतिक या गैर कानूनी आचरण करके सफलता पाने के लिये पागल बने हुये हैं! शायद आचरण की शुद्धता तो केवल मंचों, पीठों और गद्दियों से दिये जाने वाले प्रवचनों तक ही सीमित होकर रह गई है! अब्राहमिक उन्मुक्त भोगवादी आचरण ही अधिकांश नागरिकों का लक्ष्य बन गया है! उपयोगितावादी आचरण ही अनुकरणीय बन गया है! पापाचार,दुराचार और भ्रष्टाचार करके आगे बढना ही आज की फिलासफी बन गई है!
वेदों में सभी प्रकार के आचरण का मूल जागरुकता या होश या सजगता को बतलाया गया है!देखिये-
यो जागार तमृच्य: कामयंते यो जागार तमु सामानि यंति!
यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्येन्योका:!! (ऋग्वेद,5/44/14)
अर्थात् जो सजग रहता है, ऋग्वेद उसे को चाहता है! जो सजग रहता है, सामवेद की ऋचाएँ उसी पर आती हैं! सजग रहने वाले से सोम कहता है कि मैं तुम्हारा प्रिय सखा या मित्र या सहयात्री हूँ!
बेहोश व्यक्ति सभी प्रकार के अनैतिक/अधार्मिक/ आपराधिक कर्म करने में तत्पर मिलेगा!तमस में डूबे हुये व्यक्ति से सदाचारी होने की आशा नहीं की जा सकती है! हमारे धर्माचार्यों ने वैदिक आचरण को त्यागकर अब्राहमिक उन्मुक्त भोगवादी जीवन- शैली को अपना लिया है!जिन धर्माचार्यों को सनातनी जनमानस के आचरण को सदाचारी बनाने का जिम्मा था, आजकल वो स्वयं ही अब्राहमिक जीवन -मूल्यों को सही मानकर चल रहे हैं!
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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119