बाल कुंडलियाँ
बाल कुंडलिया छंद
विनती है प्रभु आपसे,रखो हमारा ध्यान।
भारी बस्ता पीठ पर ,बच्चे हम नादान।।
बच्चे हम नादान ,विषय पढ़ने हैं सारे।
बैठूँ पुस्तक खोल, दिखे हैं दिन में तारे।
भूले सारे खेल ,दिखे मस्ती भी छिनती।
बदलो ये हालात,सुनो इतनी सी विनती।।
पल में बनते दोस्त वे ,पल में जाते रूठ।
भोले बच्चों को कभी ,रास न आता झूठ।।
रास न आता झूठ ,हमेशा मस्ती करते।
होते हैं निर्भीक ,नहीं खतरों से डरते।
लगती है जब चोट,छिपें माँ के आँचल में।
माँ की अद्भुत फूँक,ठीक करती है पल में।।
बच्चा जो चोरी करे ,बोले सबसे झूठ।
उसके प्यारे दोस्त सब,उससे जाते रूठ।।
उससे जाते रूठ,करे जो सदा लड़ाई।
उसका कोई साथ ,नहीं देता है भाई।
सब करते हैं प्यार,रहे जो सीधा-सच्चा।
करता अच्छे काम,हमेशा अच्छा बच्चा।।
तीखी मिर्ची है नहीं,दादी मुझे पसंद।
मीठा खाने से सदा ,मिलता है आनंद।।
मिलता है आनंद,जलेबी जब भी खाऊँ।
लड्डू मोतीचूर, इमरती खा इतराऊँ।
खाकर पेड़ा, खीर,बात इतनी है सीखी।
करें न लोग पसंद,चीज जो होती तीखी।।
करे गिलहरी हर समय ,भाग-दौड़ भरपूर।
कुतर-कुतर फल खा रही,लगे पेड़ पर दूर।।
लगे पेड़ पर दूर,दौड़ सरपट चढ़ जाती।
लंबी झबरी पूँछ, सदा रहती लहराती।
बनी धारियाँ तीन,पीठ पर देह छरहरी।
नन्हा प्यारा जीव,खूब श्रम करे गिलहरी।।
भरते रहते हर समय,आकर सबके कान।
इनसे रहना दूर सब ,मच्छर हैं शैतान।।
मच्छर हैं शैतान ,मित्र की करें बुराई।
लगता गाते गीत ,यही इनकी चतुराई।
करें आक्रमण खूब,पाप से कभी न डरते।
चूसें सबका खून,शक्ति का दम ये भरते।।
मूली, गाजर बहन हैं ,रहती दोनों साथ।
चलती हैं वे हर समय,पकड़ हाथ में हाथ।।
पकड़ हाथ में हाथ ,निभातीं अपना वादा।
शलजम रहे प्रसन्न, बना है उनका दादा।
पा खीरे का साथ ,घूमती दोनों फूली।
हुआ टमाटर लाल ,देखकर गाजर मूली।।
मोटी लंबी नाक है, बड़े-बड़े हैं कान।
जोकर को हैं मानते,सब सर्कस की शान।।
सब सर्कस की शान,हरकतें ऐसी करता।
हँस-हँस फूले पेट ,वेश अद्भुत है धरता।
पहने ऊँची पैंट, बनाकर घूमे चोटी।
करता हँसी मजाक,शक्ल है भद्दी मोटी।।
बनकर डाॅक्टर शहर से,जब आया खरगोश।
जंगल में मंगल हुआ,दिखा गजब का जोश।।
दिखा गजब का जोश,सभी पशु थे आभारी।
करना ठीक इलाज, दूर होगी बीमारी।
जाना नहीं विदेश, यहीं पर रहना तनकर।
रखना सेवा भाव, हमेशा डाॅक्टर बनकर।।
चिड़िया रानी बैठती ,जब आकर के डाल।
कर चूँ-चीं है पूछती ,क्या है सबका हाल।।
क्या है सबका हाल,मधुर संगीत सुनाती।
कुतर-कुतर फल रोज,पेड़ पर बैठी खाती।
मेहनत करती रोज,खोजती दाना पानी।
कुदरत का वरदान, हमारी चिड़िया रानी।।
डाॅ बिपिन पाण्डेय