#दृष्टिकोण-
#दृष्टिकोण-
■ पैरवी ; थोथे रिश्तों की।
●प्रणय प्रभात●
“गर्मी में एक खिड़की, खुलती है हवा आए।
सर्दी की रात खिड़की, वो बंद भी होती है।
रिश्तों में गर्मजोशी, घट जाए नया क्या है,
जो आग भड़कती है, वो मंद भी होती है।।”
आत्मकथ्य के तौर पर बस इतना कहना पर्याप्त होगा कि अवसर और स्वार्थ के इस नए दौर में सम्बंध भी खिड़की जैसे हैं। जो मौसम मतलब हालात और ज़रूरत के हिसाब से बदलते यानि खुलते व बन्द होते रहते हैं। इसमें ताज्जुब काहे का? बस ऐसा सोचेंगे तो न हताश होंगे, न दुखी। सोच यदि इन पंक्तियों जैसी सकारात्मक हो।*
संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मप्र)