दोहा पंचक. . . विविध
दोहा पंचक. . . विविध
कल तक हमने जो किया, वह थी कल की बात ।
विगत काल को भूल फिर, करें नयी शुरुआत ।
वर्तमान से रूठ कर, किया विगत से प्यार ।
हासिल यादों का हुआ, इस दिल को संसार ।।
कौन यहाँ किसके लिए, जीता मरता यार ।
मतलब निकला सब चले, अपने – अपने द्वार ।।
अपने मन की जो रखे , अपने मन में बात ।
उसके मन के कौन फिर, समझेगा हालात ।।
सबके मन में स्वार्थ की, चलती रहती जंग ।
क्या समझें इंसान का, क्या है असली रंग ।।
सुशील सरना / 6-11-25