चीख़ (लेख)

सुना है चीखों की ध्वनि को कभी क्या…?
बताओं सुना है कभी रुंदन करती तो.कभी उन्माद मचाती…..
तो कभी हृदय के दर्द को बाहर निकालती चीख़ को।
नहीं होती चीख़ें एक जैसी…..
उनमें भी तरह-तरह की अपेक्षाएं आकांक्षाएं और दर्द छुपे रहते है।
कभी किसी को पाने की अभिलाषा में चीख़ उठती है
तो कभी किसी को खो देने के डर से चिंघाड़ उठती है चीखें….
चीखना उद्दंडता नहीं है,
चीखने की प्रक्रिया में एक बार प्रवेश करके देखो तब पता चलेगा कि चीख़ की क्या पीड़ा है उसे महसूस करके देखो
साधारण व्यक्ति नहीं चीख़ सकता क्योंकि वह डरता है कि यदि मैं चीख़ा तो लोग क्या कहेंगे…??
चीख़ने के लिये हिम्मत और साहस की ज़रूरत होती है
जो हर किसी के पास नहीं होती,
अपनी बहुत सारी अच्छाइयों का नकाब हटा असहज होना पड़ता है, खुद से लड़ना पड़ता है…..!!
खुद को दुसरो के विपरीत बनाना पड़ता है, तब कोई व्यक्ति चीखने की हिम्मत जुटा पाता है।
चीखने की प्रक्रिया में उतरते वक़्त हमें उपहास और बतमीज़ी का ठीकरा झेलना या सहना पड़ता हैं तब जाकर कोई चीख़ निकाल पाता है हर कोई नहीं।
लोग सोचते हैं कि व्यक्ति अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए यह हथकंडा अपना रहा है इसलिए ऐसा कर रहा है ….,
लेकिन हाँ कुछ हद तक यह सच भी हो सकता लेकिन पूरी तरह से नहीं क्योंकि चीख़ खुद दर्द से भरी होती है…..
जो खामोशी को तोड़ती है……
तब जाकर गला फाड़ कर वो बाहर निकलती है।
खुद में कडवाहट पैदा करती हैं तब वह अपने अंदर चीख के प्राण डालती है, तब एक चीख़……चीख़ बन कर के बाहर निकलती है।
हर व्यक्ति की चाहत रहती है मैं सौम्य सुशील और दया करुणा से ओत प्रोत रहूँ ।
मेरी छवि हमेशा जेंटलमैन की रहे और तब वो अपना सारा प्रयास और ध्यान अपने छवि बनाने में निकालता और वह हमेशा यही चाहता है कि अच्छाइयों का नकाब कभी ना मेरे चेहरे से हटे पर कहीं ना कहीं उसके अंदर यह कश्मकश चलती रहती है कि मैं अपना दर्द कैसे बाहर निकलूं क्या करूं किस तरह से अपने आप को शांत करूं और वही शांत करने की प्रकिया कहीं ना कहीं चीख़ मैं तब्दील हो जाती है।
लेकिन यह हर कोई कहाँ समझता हैं, ज्यादा तर तो यहीं कहते सुने जाते है कि बहुत ही शॉर्टटेंपर्ड व्यक्ति है…..जो अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए चीख़ का सहारा ले रहा है, खुद को संभालने की इसके अंदर जरा भी समर्थतता नहीं है , पर उसकी बेबसी उसकी लाचारी उसके अंदर पनपता दर्द पीड़ा का सागर जो उथल-पुथल और तूफान मचाए हुए था उसका क्या…??
चीख़ कमजोरी नहीं है चीख़ ऐसा दर्द भरा एहसास है जो सारे दर्द को इकट्ठा करके गले से फाड़ता हुआ बाहर निकालता है लेकिन हम समझने में यहीं गलती करते है कि वह कमजोर है, पर वह कई टुकड़ों में टूट गया है
अपने दर्द से पीड़ा से इसलिए वह अपनी घुटन को बाहर निकलने के लिए व्यक्ति ने यह रास्ता चुन…..जिसे शायद कोई समझ नहीं पाता पर वो चीख़ समझ जाती है।
मधु गुप्ता “अपराजिता”
24/2/2025✍️✍️