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5 May 2024 · 1 min read

सुस्त हवाओं की उदासी, दिल को भारी कर जाती है…

सुस्त हवाओं की उदासी, दिल को भारी कर जाती है,
ठहरी यादों की कश्तियाँ, जब पानी पर लहराती हैं।
साँसों में घुले बचपन को, आँखों के परदों पर सजाती है,
माता-पिता के चेहरों में गुम, उस बेफ़िक्र जमाने में पहुंचाती है।
जीवन की कठिनाईयां जहां, बस क़िताबों के पन्नों तक समाती है,
ख़्वाबों की ऊंचाइयों में, गुब्बारों से भरा आसमां दिखाती है।
पैर हैं छोटे, चादरें बड़ी, नींदें बिन पूछे चली आती हैं,
कैरियों का होता है स्वाद अनूठा, टोली यारों की रंग जमाती है।
छोटी-छोटी उपलब्धियां, पिता की आँखों को चमकाती हैं,
मनपसंद भोजन के निवाले, माँ हाथों से अपने खिलाती है।
बारिश की बूँद ने छुआ और, धरा वर्त्तमान में खींच लाती है,
जहां रुग्ण पिता की खामोशी, दिल के टुकड़े कर जाती है।
जिन क़दमों ने चलना सिखाया, वो अब सहारों को कदम बनाती है,
आत्मविश्वास से भरी वो निग़ाहें, विवशता उम्र की झलकाती है।
लुका-छिपी वो बचपन की, खेल ज़िम्मेवारियों के खेलाती है,
गम से भरी कंटीली राहों को, मुस्कुराते हौंसलों से मिलाती है।

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