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सजना शीतल छांव हैं सजनी

आग सी बरस रही सूरज से, दिन भर लू सी चलती है
गर्मी गर्मी उफ्फ ये गर्मी, जैंसे जान निकलती है
चैन नहीं दिन रैन, बिन साजन भट्टी सी जलती है
प्रेम अगन की तपन, तन मन प्रेम अग्नि में जलता है
पिया बिना एक-एक पल, दिल को बरसों सा लगता है
साजन के संगमें , शीतल बन जाती है जेठ की दुपहरी
साजन के संग में गरम हवाएं,ठंडी हो जाती बसंती सी
सजना शीतल छांव है सजनी, गर्मी भी खूब सुहाती है
संग सजना के गरम हवा भी, अमराई बन जाती है
सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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