विक्रमी सम्वत्-2082 की हार्दिक शुभकामनाएं

विक्रमी सम्वत्-2082 की हार्दिक शुभकामनाएं
मानव सृष्टि सम्वत् -1960853126
कलि सम्वत्-5126
विक्रमी सम्वत्-2082
के आगमन पर सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं!
माना कि इस समय हम भारतीय हमारे नेताओं की लचर और लंगडी सोच के कारण विश्वगुरु की जगह पर विश्वगरीब बने हुये हैं। लेकिन हजारों वर्षों तक यह राष्ट्र अपनी प्रतिभा, अपने पुरुषार्थ, अपने युद्ध कौशल, अपने विज्ञान, अपनी चिकित्सा, अपनी खेती-बाड़ी,अपनी राजनीति, अपनी संस्कृति, अपने दर्शनशास्त्र, अपने व्यापार के कारण विश्वगुरु भी रहा है। पिछले सात दशकों ने हमारे नेताओं, धर्मगुरुओं और पूंजीपतियों की पोल खोलकर रख दी है। संन्यासी, योगी, कथाकार, मुनि,संत, महामंडलेश्वर तक लूट-खसोट में लगे हुये हैं। जमीनी समस्याओं से किसी को कोई मतलब नहीं है। बस,अपना धंधा पानी चलता रहे। सर्वसाधनसंपन्न भारत राष्ट्र को गोरे और काले अंग्रेजों ने मिलकर भिखारी बना डाला है। नवसंवत्सर शुरू होने वाला है।
हमारी धरती के लिए सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम, सर्वाधिक उपयुक्त, सार्वभौमिक, सार्वकालिक, पुरातन तथा भौतिक व आध्यात्मिक रुप से सृजनात्मक कालगणना सनातन नवसम्वत्सर कालगणना है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से समस्त धरा पर भौतिक रूप से जल,वायु,हवा,पर्यावरण, ऋतु,खेती-बाड़ी,वृक्ष-लता-पेड-पौधों-फूलों-बीजों-औषधियों-जंगलों-पहाडों-नदियों-झरनों-तालाबों आमूल बदलाव होता है। इस भौतिक बदलाव के साथ-साथ धरती के उत्तरी ध्रुव पर अखिल ब्रह्मांडीय प्राण ऊर्जा के प्रवाह में बदलाव होने से मानव प्राणी में स्थित उत्तरी ध्रुव सहस्रार चक्र/ ब्रह्मचक्र/ ब्रह्मरंध्र/कुंडलिनी में स्थित सुषुम्ना, चित्रिणी, वज्रिणी, ब्रह्मणी, इडा, पिंगला, आज्ञा चक्र से लेकर मूलाधार चक्र रुपी दक्षिणी ध्रुव में परिवर्तन होते हैं। इस परिवर्तन या बदलाव या अंतराल या मध्यम या खालीपन का प्रयोग चेतना के सुधार व परिष्कार के लिए भी ऋषि-महर्षि-योगी-संन्यासी-स्वामी-मुनि-तपस्वी लोग सनातन से करते आए हैं। भारत से अलग चीनी या मिस्री या परसियन या युनानी या रोमन या अरबी आदि कालगणनाओं में यह रहस्य मौजूद नहीं है। इनमें से अधिकांश कालगणनाएं किसी न किसी राजा या सम्राट या देवता या राष्ट्र से जुडी हुई हैं जबकि सनातन नवसंवत्सर कालगणना समस्त भौतिक जगत् में बदलाव या प्राणिक जगत् के स्पंदन/बदलाव से संबंधित है। गणितीय ज्योतिष के ग्रंथों में इसका विस्तार उपलब्ध है।कयी सदियों तक आततायी क्रूर अब्राहमिक विदेशी हमलावरों द्वारा किये गये विध्वंस के कारण विभिन्न क्षेत्रों में किये गये विध्वंस के साथ-साथ सनातन वैदिक कालगणना भी बुरी तरह से प्रभावित हुई। कार्नवालिसी-हंटरी- मैकालयी-विलीयमी पूर्वाग्रहपूर्ण, आधारहीन, कपोलकल्पित, मनमाने बदलाव व दुष्प्रचार ने तो सनातन वैदिक कालगणना को दुषित करने में पूरा जोर लगा दिया । सन् 1947 ईस्वी के बाद नेहरू से लेकर मोदी तक, कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, संघ से लेकर रामकृष्ण मिशन तक, राधास्वामी से लेकर गुरमीत राम तक, ब्रह्माकुमारी से लेकर जग्गी वासुदेव तक, विभिन्न शंकराचार्यो से लेकर ओशो रजनीश तक अधिकांश ने विदेशीय कालगणना को भारत पर थोपने का काम किया है। आर्यसमाज से कुछ क्रांतिकारी किये जाने की आशा थी लेकिन पद-प्रतिष्ठा-अहम्-धन-दौलत की लालसा ने इस संगठन को भी पंगु तथा पाश्चात्य का अंधानुकरणी बना डाला है। यह क्रांतिकारी संगठन भी अब केवल नारेबाजी तथा वैदिक सिद्धांतों पर शुष्क तर्क-वितर्क करने तक सीमित हो गया है। भारतीय शिक्षा-दीक्षा-परीक्षा-आचरण-राजनीति-व्यापार-प्रबंधन-योग-धर्म-अध्यात्म-कथा आदि हरेक क्षेत्र में मसीही नव वर्ष घुसपैठ बनाए बैठा है। सनातन वैदिक कालगणना को वर्ष में एक बार याद करके फिर पूरे वर्ष भर मसीही कालगणना का प्रयोग चलता है। नेता, धर्मगुरु, कथाकार, प्रचारक, अधिकारी,व्यापारी, शिक्षक, योगाचार्य आदि सभी पाश्चात्य रंग में रंगे रहते हैं। मसीही नव वर्ष पर सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर जो उत्सव आयोजित किये जाते हैं उनका हजारवाँ हिस्सा उत्सव भी सनातन वैदिक कालगणना के हिस्से में नहीं आता है। सर्वाधिक दुर्गति समकालीन हिंदु हितकारियों के शासन प्रशासन में देखने को मिल रही है। जो धर्मगुरु हमारे विभिन्न आदरणीय महापुरुषों के जन्मदिवस या उनसे जुड़े हुये प्रसंगों के अवसर पर व्यापारवश विविध प्रकार की रहस्यमयी साधनाएं करवाकर चेतना में रुपांतरण के लिए वृहद् आयोजन करते हैं उनके लिये यह ध्यान रहे कि भीतरी गहराईयों में उतरने के लिये नवसंवत्सर की शुरुआत का समय सर्वाधिक सहज, सहायक व कम उलझाव वाला होता है। नवसंवत्सर पर चेतना में रुपांतरण के इस स्वर्णिम अवसर को केवलमात्र नवरात्र में भोजन के कर्मकांड तक या देवी उपासना तक सीमित न रखकर आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व देना शुरू करें। सनातन भारतीय वैदिक सीख यही है। व्यर्थ की नोटंकी या दिखावा या पाखंड न करके इसके लिए कुछ जमीनी करें।जिन व्यक्तियों, संगठनों, नेताओं, धर्मगुरुओं के पास सत्ता बल, धनबल व जनबल है वो भी इसके हितार्थ जब कुछ नहीं कर रहे हैं तो दाल में काला नहीं अपितु पूरी दाल ही काली लग रही है। सनातन हितैषी कहलवाने वालों ने भी सनातन भारतीय कालगणना के लिये कोई सम्मान प्रदर्शित नहीं किया है। ये भी मैकाले, मार्क्स और मैक्समूलर के ही अंधानुयायी निकले।बस ,ये भी बातों के ही धनी हैं। हकीकत में इन्होंने सनातन धर्म और संस्कृति के प्रतीकों के रक्षार्थ कुछ भी नहीं किया है। जो नेता और धर्मगुरु वेदों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्र आदि का नाम तक लेने से परहेज़ करते हैं, उनसे सनातन धर्म और संस्कृति के हितार्थ कुछ भी किये जाने की आशा नहीं है।झूठ,कपट और छल से सत्ता मिल गई है, अब सत्ता का सुख भोगो। भारत, भारतीय और भारतीयता भाड में जाओ। बहुसंख्यक सनातनी भारतीयों का हितैषी कोई भी नहीं है लेकिन इनके शोषक सभी हैं।इनका तो यूज एंड थ्रो तथा डिवाइड एंड रुल की की तरह यूज किया जा रहा है। यदि किसी ने सच में सनातन धर्म और संस्कृति के हितार्थ आवाज उठाई तो उसे तुरंत सनातन द्रोही, राष्ट्रद्रोह घोषित करके अपमानित किया जायेगा। ये तो यवनों, मंगोलों, तुर्कों,अफगानियों और अंग्रेजों से भी आगे निकले।जो भी हो लेकिन एक बार फिर से सभी मित्रों को नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं!
…………..
आचार्य शीलक राम
वैदिक योगशाला
कुरुक्षेत्र