अधर्म उन्नति और पूर्व पुण्य (✍🏻 स्वछंद कवि आलोक पांडेय)

अधर्म का आचरण कर, यदि कोई चढ़ता जाए,
मत समझना यह उसकी नीति, यह तो पुण्य का दान है पाए।
जैसे दीपक बुझने से पहले, तेज चमक दिखलाता है,
वैसे ही पापों का घड़ा भरकर, भाग्य उसे फुसलाता है।
पूर्व जन्मों के संचित कर्म, देते उसको यह सहारा,
किन्तु अधर्म की नींव पर टिके, महल कब तक है ठहरा?
जैसे पतझड़ से पहले तरुवर, कुछ पल हरियाली धारे,
वैसे ही दुष्कर्मी जग में कुछ दिन, सुख के सपने निहारे।
कर्मों का लेखा-जोखा होता, पल-पल का हिसाब है रखा,
अधर्म की राह पर चलकर, कब किसने सच्चा सुख चखा?
आज जो दिखता वैभवशाली, कल विपदा घेरेगी उसको, .
पूर्व पुण्य का कोष जो रीता, कौन बचाएगा तब उसको?
इसलिए हे मानव समझो, क्षणिक उन्नति से मत भरमाओ,
धर्म का मार्ग ही सत्य शाश्वत, इस पर ही कदम बढ़ाओ।
अधर्म की छाया क्षणभंगुर, पुण्य की आभा चिरस्थायी,
आज का सुख जो पापों से उपजा, कल देगा गहरी खाई।
✍🏻 स्वछंद कवि आलोक पांडेय
निवास: गरोठ, मंदसौर, मध्यप्रदेश