चौपाला छंद- प्रकृति की सीख

सुंदर शोभित यह प्रकृति हमारी।
सदा खिलाती जो मन की क्यारी।।
कल-कल, कल-कल हैं नदियाँ बहतीं।
भाव रखो निर्मल हमसे कहतीं।
उच्च शिखर के ये पर्वत सारे।
दर्शाते पावन लक्ष्य हमारे।।
छटा सुबह की होती अति प्यारी।
सदा खिलाती जो मन की क्यारी।।
सागर निज गहराई दिखलाता।
धैर्य दिव्यता की शक्ति बताता।।
भार उठाना वसुधा दर्शाती।
मानव को श्रम का पाठ पढ़ाती।।
प्रकृति बचाना है जिम्मेदारी।
सदा खिलाती जो मन की क्यारी।।
हरित प्रकृति है जग जीवन दाता।
खुशियों से जो है रखती नाता।।
ओम प्रकृति की आवाज उठाता।
प्रकृति शक्ति का सत भाव जगाता।
आज जरूरत है जिसकी भारी।
सदा खिलाती जो मन की क्यारी।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम
शिक्षक व साहित्यकार
कानपुर नगर