#लघुकथा-

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■ डर का नाम मुहब्बत
【प्रणय प्रभात】
बीते साल हनुमान जयंती की बधाई का संदेश ग़लती से उसे भी चला गया, जिसे अपनी ग़लती कभी ग़लती से भी ग़लती नहीं लगती। हाँ-हाँ, उसी थोथी अदा और अकड़ की मारी जीवात्मा को। बहरहाल, उत्तर न आना था और ना ही आया। ग़लती समझ आई, तो सतर्कता के भाव जागृत हुए। महीनों तक नहीं हुई कोई बधाई संदेश या शुभकामना भेजने की गुस्ताख़ी। वक़्त बीतता गया।
साल भर बाद आज ग़लती से ऐसी ही ग़लती फिर हो गई। इस बार शनिश्चरी अमावस्या के साथ सुप्रभात का संदेश जल्दबाज़ी के चक्कर में चला गया। वो भी शनिदेव की तस्वीर के साथ। इससे पहले कि मैसेज डिलीट कर अपनी ग़लती सुधार पाते, जवाब स्क्रीन पर था। प्रणाम की पांच इमोजी के ऊपर लिखा था- “जय जय शनिदेव।”
तत्काल समझ में आ गया कि मुहब्बत की मीनार कलियुग में डर की नींव पर खड़ी होती है। तभी तो हनुमान जी से न डरने वाले अकड़ के मारे भी शनिदेव से ख़ौफ़ खाते हैं। ख़ास कर वो जिन्हें हनुमान लला की कला का अता-पता न हो। फ़िलहाल, जय हो शनिदेव आपकी। असर तो दिखाया कुछ।।
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-सम्पादक-
न्यूज़&व्यूज (मप्र)