“लम्हें कहाँ मिलते हैं”

कल सुबह किसने देखा है, चलो आज ही मिलते हैं।।
दुनिया की इस झूठी शान में, हम क्यों अपने आप को कैद रखते हैं।।
कल सुबह तक क्या मालूम, सांसों की डोरी टूट कर बिखर जाए।
चलो आज सब भुला के शिकवे, गले रूठो के जा कर मिलते हैं।।
कल सुबह आने तक, बीच में लम्बी काली रात बाकीं है।
सो जो करना है आज ही कर ले,बीते लम्हें लौट के कहां मिलते हैं।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”