कितना कुछ है मेरे भीतर

भावों को तो युँ अक्सर, शब्दों का सहारा मिल जाता है
पर कितना कुछ जो है भीतर, भीतर मेरे रह जाता है
बात कहूँ जो कोई जुबानी
हो जाती वो क्यूँ बेमानी
व्यथा कहूँ मैं सुना कहानी
सुनने वाले हैं बेध्यानी
घावों को तो युँ अक्सर, मलहम का सहारा मिल जाता है
पर कितना कुछ ज़ख्म है भीतर, भीतर मेरे रह जाता है
मन लहरों से भाव उठे
तन अधरों से शब्द जुड़े
अभिलाषा की राहों में
अक्षर राही बनके खड़े
डूबे को तो युँ अक्सर, तिनके का सहारा मिल जाता है
पर कितना कुछ डूबा है भीतर, भीतर मेरे रह जाता है
सूरज से जो ताप मिले
उसी ताप से चाँद जले
फैले अम्बर के गुलशन में
नील-कुसुम तारे हैं सिले
काँटों को तो युँ अक्सर, फूलों का सहारा मिल जाता है
पर कितना कुछ रंग है भीतर, भीतर मेरे रह जाता है
नयनों ने जो दृश्य उकेरे
लिख देती दिल की स्याही
लफ्ज़ जो लेते हर्फ़ से फेरे
सतर भी ख़्वाबों से ब्याही
सपनों को तो युँ अक्सर, आँखों का सहारा मिल जाता है
पढ़ते, सुनते, गुनते, बुनते, हिय कितना कुछ लिख जाता है
–कुँवर सर्वेन्द्र विक्रम सिंह ✍️
★स्वरचित रचना
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