आधुनिकता बनाम परंपरा

सामाजिक भटकाव: आधुनिकता बनाम परंपरा
मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु और प्रयोगशील है। वह हमेशा नई चीजों की तलाश में रहता है। नए आविष्कार करता है और पुराने तरीकों को छोड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ता है, लेकिन क्या हर आधुनिकता प्रगति की गारंटी होती है? क्या बदलाव हमेशा सही होते हैं? इतिहास बताता है कि अक्सर हम नई चीजों की ओर आकर्षित होते हैं, उन्हें अपनाते हैं। बाद में जब उनकी कमियां उजागर होती हैं, तो अंततः उन्हीं पुरानी परंपराओं और जीवनशैली की ओर लौट आते हैं, जिन्हें हमने कभी पिछड़ा समझकर छोड़ दिया था।
समाज में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जहां परंपराओं को त्यागकर आधुनिकता को अपनाया गया, लेकिन कुछ समय बाद हमें एहसास हुआ कि पुरानी राहें ही बेहतर थीं। यह बदलाव सिर्फ जीवनशैली तक सीमित नहीं, बल्कि भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक और फैशन तक में देखा जा सकता है। कभी मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाना आम बात थी, फिर स्टील और प्लास्टिक का दौर आया। स्वास्थ्य पर जब इसका नकारात्मक असर दिखने लगा, तो लोग दोबारा मिट्टी और तांबे के बर्तनों की ओर लौटने लगे। इसी तरह, कभी अंगूठे के निशान को अशिक्षा का प्रतीक माना गया और दस्तखत का दौर आया, लेकिन डिजिटल युग में फिर से बायोमेट्रिक पहचान यानी अंगूठे की वापसी हो गई।
इस लेख में हम ऐसे ही उदाहरणों की पड़ताल करेंगे कि कैसे समाज बार-बार उसी चक्र में फंसता है—आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होता है और फिर अंततः उन्हीं की ओर लौट आता है।
क्या इतिहास का पहिया घूमता रहता है?
1. परंपराओं से आधुनिकता, फिर वापसी: एक समय था जब मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाया और खाया जाता था। फिर स्टील और प्लास्टिक के बर्तन आए। लोगों ने इसे आधुनिकता माना, लेकिन जब प्लास्टिक और स्टील से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम सामने आए, तो फिर से मिट्टी के बर्तनों की मांग बढ़ने लगी।
इसी तरह, पहले अंगूठे का निशान पहचान का प्रमुख साधन था, लेकिन शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण दस्तखत को जरूरी मान लिया गया। अब डिजिटल दौर में फिर से बायोमेट्रिक पहचान के रूप में अंगूठे की वापसी हो चुकी है। यह दर्शाता है कि आधुनिकता के नाम पर किए गए कई बदलाव अंततः पुराने तरीकों की उपयोगिता को ही सिद्ध करते हैं।
2. गांव वापसी: कभी गांवों की खुली हवा, शुद्ध भोजन और सादगी भरा जीवन आम था। फिर लोग शहरों की चकाचौंध से प्रभावित हुए, सुख-सुविधाओं की लालसा में गांव छोड़ दिए। जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि शहरों की भीड़भाड़, प्रदूषण और तनाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब ‘फार्महाउस कल्चर’ और ‘विलेज टूरिज्म’ इस बात का प्रमाण हैं कि लोग फिर से गांवों की शांति की ओर लौटने लगे हैं।
3. आधुनिकता और पुराना फैशन: पहले कपड़े केवल जरूरत के हिसाब से पहने जाते थे। फिर संपन्नता आई, तो प्रेस किए हुए, चमकदार कपड़े फैशन बन गए। लेकिन फैशन इंडस्ट्री ने हमें फिर से वही फटे-पुराने कपड़े पहनने पर मजबूर कर दिया, जिन्हें कभी गरीबी का प्रतीक माना जाता था। आज ‘डिस्ट्रेस्ड जीन्स’ और ‘विंटेज फैशन’ की बढ़ती मांग दिखाती है कि आधुनिकता की आड़ में हम बार-बार उन्हीं पुरानी शैलियों की ओर लौट रहे हैं, जिन्हें हमने कभी त्याग दिया था।
4. बचपन की मासूमियत छीनकर, फिर वही राह: एक समय था जब बच्चे मिट्टी में खेलते हुए बड़े होते थे, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से विकसित होती थी। फिर ‘साफ-सफाई’ और ‘संक्रमण के डर’ के नाम पर बच्चों को मिट्टी से दूर कर दिया गया। अब वैज्ञानिक शोध यह साबित कर रहे हैं कि मिट्टी में खेलने से बच्चों की इम्यूनिटी मजबूत होती है। यानी, जिसे कभी अस्वस्थ मानकर रोका गया था, वही अब वैज्ञानिकों की नजर में सेहत के लिए जरूरी हो गया है।
5. यातायात और परिवहन: पहले लोग साइकिल या पैदल चलते थे, फिर कारों और बाइक का दौर आया। अब ‘फिटनेस अवेयरनेस’ के चलते फिर से लोग साइकिलिंग और पैदल चलने की ओर लौट रहे हैं।
6. खान-पान की आदतें: पहले मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) खाए जाते थे, फिर प्रोसेस्ड फूड और मैदा का चलन बढ़ा। अब लोग फिर से ‘मिलेट्स’ (मोटे अनाज) की ओर लौट रहे हैं।
7. परिवारिक संरचना: पहले संयुक्त परिवार का चलन था, फिर एकल परिवारों की संस्कृति आई। अब बुजुर्गों की देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझते हुए फिर से संयुक्त परिवारों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
8. शारीरिक श्रम और जिम कल्चर: पहले लोग खेती, मजदूरी और दैनिक कामों में शारीरिक श्रम करते थे। फिर मशीनों और आरामदायक जीवनशैली के कारण लोग जिम में जाकर कसरत करने लगे, जो मूल रूप से प्राकृतिक श्रम की जगह ले चुका है।
9. आयुर्वेद और एलोपैथी: पहले घरेलू नुस्खों और आयुर्वेदिक उपचारों का प्रचलन था। फिर ऐलोपैथी और आधुनिक दवाओं का दौर आया। अब फिर से लोग प्राकृतिक चिकित्सा, योग और आयुर्वेद की ओर लौट रहे हैं।
आधुनिकता की दौड़ में या भटकाव: यह चक्र हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं, या बस नए प्रयोगों में उलझकर वही पुरानी राहें फिर से खोज रहे हैं? क्या आधुनिकता सिर्फ एक भ्रम है, जिससे बाहर निकलने में हमें कई पीढ़ियां लग जाती हैं?
निष्कर्षः वास्तविकता यह है कि प्रकृति ने जो दिया है, वही सर्वोत्तम है। बदलाव आवश्यक हैं, लेकिन बिना सोचे-समझे हर आधुनिक चीज को अपनाना बुद्धिमानी नहीं। हमें यह समझना होगा कि कुछ चीजें अनमोल होती हैं, जिन्हें बार-बार छोड़ने और अपनाने के बजाय स्थायी रूप से स्वीकार करना ही बेहतर है। सही प्रगति वह नहीं जो हमें बार-बार पुरानी राहों पर लौटने पर मजबूर करे, बल्कि वह है जो संतुलन और स्थिरता प्रदान करे। आधुनिकता और परंपरा के बीच सामंजस्य ही असली बुद्धिमानी है।