गृह शोभा का गृह प्रवेश

गृह शोभा का गृह प्रवेश
गृह शोभा का गृह प्रवेश की पहली आस की नई धूप का छाया एक बादल में दिखने वाला किरण हो कि जो मेरी उत्साह को बढ़ाए उस आशा में नवनीत किरण हो बादल है छाया मेरी जिंदगी में कुछ ऐसे कि दिल के आयाम को जुड़े कैसे हम आखिर कविता में संजोने को समर्पण हो या अर्पण है अब तुम्हारे लिए हम तो तेरे दर पर अभिमंगल है और अभिनंदन है अभिवादन है तुम्हारे प्रेम का जो हमारा जिंदगी का कमंडल है।
तुम्हारा प्रेम मेरी जिंदगी का संगीतमय आनंद का आधार है,
और मेरी जिंदगी में शब्द को पिरोने वाला सार्थकता का एक नव बिहार का खुशनुमा छाया जाल है।
कविता रचनाकार: बाबिया खातून