नफरत का व्यापार कर रहे हैं

अपनों के ही दामन पर वार कर रहे हैं।
लोग यहां नफरत का व्यापार कर रहे हैं।
एक दूसरे के घर की इज्जत उछाल कर,
जानें कितने जीवन बेकार कर रहे हैं।
नहीं जज्बात दिल में प्रेम के एक भी हैं,
मगर प्रेम का बगुले इजहार कर रहे हैं।
सभी जातियों को रहना इसी देश में है,
स्वयं से न जानें क्यों तकरार कर रहे हैं।
भूल चुके हैं शायद अपनी मान- मर्यादा,
आए दिन नग्नता का प्रचार कर रहे हैं।
देवी समझ कर पूजते थे जिन्हें ये कभी,
उन्हीं बहन- बेटियों का शिकार कर रहे हैं।
करते हैं जुर्म हर दिन सरेआम चौक पर,
कोर्ट में गुनाह से इंकार कर रहे हैं।
छोड़ साथ अपने धर्म जाति के लोगों का,
दूसरे मजहब पर ऐतबार कर रहे हैं।
निभा रहे रिश्ते गैर धर्म के लोगों से,
अपने ही भाइयों पर प्रहार कर रहे हैं।
अपनी ही जाति धर्म के व्यक्ति से उलझकर,
अपने अरि का सपना साकार कर रहे हैं।
जातिवाद के नाम पर लड़ इक दूसरे से,
हँसता- खेलता वतन बेजार कर रहे हैं।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)