रूखसत ए वक़्त में हँसते हुए जाते देखा
रूखसत ए वक़्त में हँसते हुए जाते देखा
दिल ने फिर दर्द में मुझको मुस्कुराते देखा,
यूँ ज़लालत से निकाला इश्क बाकी न रहा
दिल के मयख़ाने में अब कोई साकी न रहा,
मालूम न था कि वो रिश्ते को हमारे ढो रहे थे
प्रेम के फूलों को वो काँटों के संग में बो रहे थे
छोड़ आए इश्क जब दिल को ठुकराया गया,
अपनो से गैरो की गिनती में जहाँ लाया गया,
अब जी तो लेंगे मगर ये ज़िंदगी इक बोझ होगी
खुद ही खुद से लड़ने की हमे ज़रूरत रोज़ होगी,,