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28 Feb 2025 · 1 min read

पहचान

मेरे साथ है
हर पल
मेरा व्यक्तिगत इतिहास
फिर उसे तिरस्कृत कर
कैसे जियूं खुले आकाश में
क्यों न उसे स्वीकार कर
मैं पा लूँ अपनी थाह
और बन जाऊँ शक्तिपुंज।

कितनी अजीब बात है
मुझसे पहले
धरती के अंतिम छोर पर
मेरे पहुंचने से पहले
पहुंच जाती है
मेरी पहचान
सभी अपरिचितों के लिए
मैं हूँ बस भारतीय
तो क्यों न
मैं अपनी पहचान को
सही रूप दूँ
क्यों न मैं अपने देश को समर्पित हूँ
जो है
न केवल मेरी
अपितु
मेरे भविष्य की भी पहचान।

—— शशि महाजन

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