पहचान

मेरे साथ है
हर पल
मेरा व्यक्तिगत इतिहास
फिर उसे तिरस्कृत कर
कैसे जियूं खुले आकाश में
क्यों न उसे स्वीकार कर
मैं पा लूँ अपनी थाह
और बन जाऊँ शक्तिपुंज।
कितनी अजीब बात है
मुझसे पहले
धरती के अंतिम छोर पर
मेरे पहुंचने से पहले
पहुंच जाती है
मेरी पहचान
सभी अपरिचितों के लिए
मैं हूँ बस भारतीय
तो क्यों न
मैं अपनी पहचान को
सही रूप दूँ
क्यों न मैं अपने देश को समर्पित हूँ
जो है
न केवल मेरी
अपितु
मेरे भविष्य की भी पहचान।
—— शशि महाजन