दोहा गीत
दोहा गीत
दोहा गीत
रावण के अभिमान को, लागे धूं-धूं आग।
ज्ञानी ध्यानी था बड़ा, माथ लगाया दाग।।
विजया दशमी पर्व की,बड़ी पुरानी रीत।
मारा दंम्भी राम ने, ली अच्छाई जीत।
नाश बुराई का किया, जागे जन के भाग।
ज्ञानी ध्यानी था बड़ा, माथ लगाया दाग।।
त्याग बुराई का करें,शुभ कर्मो को धार।
छोड़ो मैली सोच को, जीवन का है सार ।।
हनु के जैसी भक्ति का,जागे मन अनुराग।
ज्ञानी ध्यानी था बड़ा, माथ लगाया दाग।।
सौ सौ रावण मन बसे,वही कराते पाप ।
कर्मो का फेरा यहाँ, छूटे कैसे छाप।।
सत की होती जीत है, करो झूठ का त्याग।
ज्ञानी ध्यानी था बड़ा, माथ लगाया दाग।।
नीयत रखते साफ जो,प्रभु का पाते प्यार।
हीरे जैसी देह है, होवे क्यों बेकार।
जीवन सत से सींच ले,जागे तेरे भाग।।
ज्ञानी ध्यानी था बड़ा, माथ लगाया दाग।।
सीमा शर्मा