चंद्र

व्योम पर चंद्र फिर मुस्कुराने लगा|
दिल सुरों को धुनो में सजाने लगा |
व्योम पर चंद्र फिर मुस्कराने लगा |
प्रेयसी बन खिली चांद की चांदनी|
रूठती औ मनाती रही चांदनी |
दूज का चाँद अब खिलखिलाने लगा |
व्योम पर चंद्र फिर मुस्कुराने लगा |
ओट में छुप गयी चंद्र की कौमिदी |
पाश घन के घिरी चंद्र की कौमिदी |
चौथ का चाँद अब तम तमाने लगा |
व्योम पर चंद्र फिर मुस्कुराने लगा |
कौमिदी ने कहा चाँद मेरा पिया |
चाँद की बन रहूं चाँद मेरा जिया |
चाँद खुश हो गया गुनगुनाने लगा |
व्योम पर चंद्र फिर मुस्कराने लगा
डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, प्रेम