प्रेम दिवस
प्रेम दिवस
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स्वार्थ के चकाचौंध में
कृत्रिम मानवता की
अंधाधुंध भीड़ में
एक दूसरे से
रोटी छीनने की होड़ में
अपनों के हक मारने की
अनवरत प्रतिस्पर्द्धा में
पल-पल होते
नैतिक पतन की रफ्तार में
रिश्तों से प्रतिपल
छल करनेवाली बयार में
प्रेम!
क्या तुम्हारा अस्तित्त्व सुरक्षित है
क्या तुम सचमुच जीवित हो
क्या समझ पाते हैं लोग
तुम्हारे मूल्य को
इस घोर कलयुग में भी
नहीं ना
फिर यह प्रेम दिवस क्यों?
–अनिल कुमार मिश्र,राँची,भारत।