रोला छंद. . .
रोला छंद. . .
शाश्वत है यह सत्य, दिवस कब सम सब रहते ।
संचय करना व्यर्थ , जगत् में सब यह कहते ।।
धूप – छाँव सा नित्य ,रंग यह जीवन बदले ।
छोड़ सभी जंजाल , राम की माला जप ले ।।
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नश्वर है संसार, बात यह सब ही जानें ।
फिर भी जग के लोग, झूठ को सत्य ही मानें ।।
मरीचिका सी प्यास , भला कब बुझने पाती ।
जीवन की हर आस, चिता में जल-जल जाती ।।
सुशील सरना / 13-2-25