बेपरवाही का आलम

क्या फर्क पड़ता है तेरे होने या न होने से ,
दुनिया नहीं रुकती ,किसी के चले जाने से ,
तू गर है तो भी ठीक , नहीं है तो भी ठीक ,
कहां फुर्सत किसी को मातम मनाने से ।
तू चिराग जलाता जा अपनी यादों के यूं ही ,
वक्त सब बुझा देगा किसी न किसी बहाने से ।
तेरे रफीक ,तेरे हमनवां ,औलाद या रिश्तेदार,
कभी थे तेरे अपने ,मगर सब हो जाएंगे बेगाने से।
तू किसके लिए है रोता ,और कैसी फिक्र दीवाने!
जो तेरा कभी था ही नहीं क्या मिलेगा अश्क बहाने से!
तू था तब भी किसी ने कभी तुझे देखा जी भर के?
सीधा सच्चा होने पर भी जख्मी किया तानों से ।
यह दुनिया ऐसी ही है संगदिलों हमेशा से ए अनु !
तू बस इनसे बेपरवाह होकर इश्क का ख़ुदा ए जाना से।