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3 May 2024 · 1 min read

जी चाहता है

वो हुस्ऩ -ए – मुजस्स़म मुमताज़ किसी तआ’रुफ़ का मोहताज़ नहीं,
उस नज़र- ए – नाय़ाब को किसी तारीफ़ की
दरकार नहीं,

इक शोला सा है भड़का ,
कय़ामत के भेस में ,
इक नूर -ए – अज़ल जलवागर है ,
हक़ीक़त के रूप में ,

चेहरा है इक ,
गुलाब सी रंगत लिए हुए ,
गेसू ऐसे खुले हैं , जिनसे धोका हो
मिस्ल -ए-अब्र का ,
झील सी नीली हैं आंखें , उमड़ते जज़्बातों का
सैलाब़ लिए हुए ,

जिनमें डूब कर मैं खुद को
भूल जाना चाहता हूं ,
अपना वुजूद खोकर मैं उनमें
फ़ना हो जाना चाहता हूँ ।

Language: Hindi
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