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10 Feb 2024 · 1 min read

हवेली का दर्द

हवेली का दर्द है
कर वीरान हवेली को जब अपने ही छोड़ जाते हैं
बहुत करीब से देखा है
इन हवेलियों को दर्द से कराहते हुए

वक्त की झुर्रियों से बोझिल
बड़ी ख़ुद्दार हैं लेकिन दरकती हुईं
ये हैं जो दीवारें कई को बेरहम वक़्त ने गिरा डाला
पर कुछ अब भी खड़े रहने की
हैं ज़िद पर अड़ी हुईं कई कमरे – कई दीवारें
उम्र की मानिंद हैं ढल चुकीं

कई कमरों के छत भी उजड़ गए
कई कमरों में तो धूप अब
छत के सुराखों से ही हैं आती
ताखों पर जमीं हैं कालिख

धरे हैं कुछ तरसते तेल को टूटे दीये
कुछ चरमराते – टूटे हुए हैं चौखट
किसी अपने के इंतज़ार में
लिए दीवार का सहारा

मुँह बाए आज भी राह तकते हैं
दहशत में आ गया तब
अक्स जब अपना नज़र आया
क्या ये दर्द है हवेली का या
उम्र जब ढलेगी . . . . . . . . . . . .

Language: Hindi
95 Views
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