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6 Nov 2016 · 1 min read

दिखाई देने वाला ख़्वाब हर क़ामिल नहीं होता

दिखाई देने वाला ख़्वाब हर क़ामिल नहीं होता
ज़ुबाँ से जो निकल जाए वो दर्देदिल नहीं होता

शमा रौशन हुई तो ख़ाक परवाना भी होता है
मुहब्बत में मिलन होना भी मुस्तक़बिल नहीं होता

चला जो तीर नज़रों का ज़िगर के पार निकला है
ख़लिश दिल में उठाकर भी वो क्यूँ कातिल नहीं होता

ज़िगर में रख के’ खुदगर्ज़ी नहीं आशिक़ बना कोई
है फ़ितरत जिसकी सौदाई वो बस ग़ाफ़िल नहीं होता

हुआ हासिल बताओ क्या यूँ नफरत पालकर दिल में
हुई जिसको मुहब्बत वो कभी संगदिल नहीं होता

बहाकर खून इंसानी तुझे हासिल न कुछ होगा
बढाना प्यार हर दिल में भी कुछ मुश्किल नहीं होता

ख़यालों में पिरोता हूँ मैं’ बस जज़्बात की लड़ियाँ
किसी का ग़म बंटाने को कुई शामिल नहीं होता

तज़ुर्बा ज़िन्दगी का मुझको बस इतना है जज़्बाती
परखना मत परखने से कोई काबिल नहीं होता
जज़्बाती

1 Like · 1 Comment · 264 Views
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