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18 Sep 2016 · 1 min read

तुझे शायद पता ही नहीं

तुझे शायद पता ही नहीं
किस तरह जीता हूँ तुझे मैं
सुबह शाम दिन रात हर पल
तेरी यादों के साये में रहता हूँ मैं
आँखें बंद करता हूँ तो
सुनता हूँ खिलखिलाहट तेरी
तेरी मुस्कुराहटों से रोशन घर करता हूँ मैं
जो तेरी आँखों में नमी देखता हूँ तो
पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार रहता हूँ मैं
चाहता हूँ तहेदिल से तुझे
तुझे शायद ख़बर ही नहीं
किस तरह नादान दिल की हसरतों को
अपने मन में कहीं छुपा कर रखता हूँ मैं
तुझे शायद पता ही नहीं
किस तरह जीता हूँ तुझे मैं

–प्रतीक

Language: Hindi
281 Views
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