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18 Sep 2021 · 2 min read

जंगल में कवि सम्मेलन

जंगल में कवि सम्मेलन
(एक व्यंग्य)

एक बार जंगल के राजा द्वारा,
जंगल में घोषणा करवाई गई।
प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को,
कवि सम्मेलन का आयोजन होगा।
सभी जानवर अपने मांद,कंदरे, गुफा,
बिल और घोंसले से बाहर निकल,
घोषणाओं को ध्यान से सुनने लगे।
सभी को अपने द्वारा रचित काव्य रचनाओं के,
साथ उपस्थित होने को कहा गया।
सब पर व्यापक असर हुआ,
मोर-मोरनी ने खूबसूरत छँटा में,
नृत्य का आंनद लेते हुए प्रणय गीत लिख डाले।
कोयल ने अपनी मीठी कूक भरी शब्दों से,
प्रातः काल में जंगल के विहंगम दृश्य को,
काव्य रुप में रच डाला।
रात्रि में नीरव वन के डरावने दृश्य का,
ऊल्लू ने खौफनाक चित्रण कर डाला।
भालू ने मधुमक्खी के छत्ते और,
उसके मधुर मधु का गुणगान कर डाला।
गिद्धों ने सड़ते लाशों से मिलते स्वादों का,
वीभत्स रस में काव्य बना डाला।
सबने अपने अपने ढंग से,
कुछ न कुछ रच डाला।
कौए ने जब कुछ नहीं सोच पाया तो,
दो-चार बार कांव- कांव से ही काव्य गढ़ डाला।
लेकिन जंगल के चतुर सियार का मन,
हर हमेशा शंका से ग्रस्त रहने लगा,
वो सोचता कि मेरा ध्यान भटकाने,
और अपना काम निकालने की ये सब साजिश है।
उसनें अब एक योजना बनाई,
और चूहों से दोस्ती बढ़ाई।
फिर इन चूहों की मदद से,
सभी तैयार काव्य रचनाओं को,
लुका-छिपी से एक -एक कर कुतरवा डाला ,
अपने मकसद में कामयाब दिखा वो,
जंगल में अफवाह फैलाया,
आएगी भीषण त्रासदी तब,
तुम कोई काव्य रचोगे जब।
जंगल में जंगली ही, हो तुम,
काव्य कथा कुछ सोचो मत।
मस्त रहो बस क्षुधा तृप्ति में,
इससे आगे कभी सोचो मत।

मौलिक एवं स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि -१८ /०९/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

12 Likes · 14 Comments · 1037 Views
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