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किराये की कोख़

एक कोख़ किराये की
जिसमें पलता है भ्रूण किसी और का
मज़बूरी किसी की भी हो
पालती है नौ महीने तक
सींचती है अपने खून से
भरतीं है उसमें अपनी मज्जा
हर एक पीड़े के साथ
साथ में एक और पीड़ा
जुदाई का बिछड़ने का
कौन समझेगा उसका दर्द
समय के चक्रव्हू मे फँसी
बस नाम की है माँ वो
यह पेट की आग ही थी
जिसकी मार से वह नौ महीने
अपने उदर में दूसरे की आग पालती रही
जलती रही गलती रही और भटकती रही
अज्ञात भय के जंगल में
जिसका वर्णन शब्दातीत है
इस वेदना को समझे कौन?
समय है मौन, समय है मौन
डॉ मनोज कुमार
मोहन नगर गाजियाबाद

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