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*इस बार दिवाली सीमा पर*

*इस बार दिवाली सीमा पर*
…आनन्द विश्वास

इस बार दिवाली सीमा पर,
है खड़ा मवाली सीमा पर।

इसको अब सीधा करना है,
इसको अब नहीं सुधरना है।
इनके मुण्डों को काट-काट,
कचरे के संग फिर लगा आग।

गिन-गिन कर बदला लेना है,
हम कूँच करेंगे सीमा पर।

ये पाक नहीं, ना पाकी है,
चीनी, मिसरी-सा साथी है।
दोनों की नीयत साफ नहीं,
अब करना इनको माफ नहीं।

इनकी औकात बताने को,
हम, चलो चलेंगे सीमा पर।

दो-चार लकीरें नक्शे की,
बस हमको जरा बदलना है।
भूगोल बदलना है हमको,
इतिहास स्वयं लिख जाना है।

आतातायी का कर विनाश,
फिर धूम-धड़ाका सीमा पर।

…आनन्द विश्वास

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