भाग्य लेखन मेरा करते हुए विधाता थे बड़े क्रोधित,
भाग्य लेखन मेरा करते हुए विधाता थे बड़े क्रोधित,
रोष अपना मुझ पर बरसा दिया,
अभागिन का दर्जा देकर किया मुझे संबोधित।
प्रेम की उष्णता तो मेरे जीवन से विलुप्त ही हो चुकी है,
सदाचार प्राप्त मुझे होता नहीं,
जिंदगी मेरी दुर्भाग्य के मोड़ पर रुकी है।
चीख मेरी अटकी पड़ी है,
गले की पिंजरे में बंधी हुई है,
बेड़ियों से उसे रोके रखा है,
वह नहीं निकल सकी है।