हां! मैं आम आदमी हूं
हां! मैं आम आदमी हूं,
यूँ तो मुझे,
सपने देखने की पूरी आजादी है,
किंतु मैं,
खुद के लिए सपने नहीं देख सकता,
मेरी जिंदगी,
जीवन के आपाधापी में उलझी,
रोजमर्रा के कामों में लिपटी,
और दो रोटी में सिमटी है।।
ऐसा नहीं है,
कि मैं बड़ा बनना नहीं चाहता,
बड़ा बनने और न बनने के बीच, एक गहरी खाई है,
जिंदगी रोटी में सिमटी है, और उम्मीदें आंखों में,
बदन ढके तो जिंदगी नंगी हो जाती हैं,
जिंदगी ढके तो बदन नंगी हो जाती हैं,
कश्मकश और जद्दोजहद में,
हर एक शाम गुजर ही जाती है।।
बंद आंखों में सपने पलते है,खुली आंखों में संघर्ष,
कड़ी धूप में बहने वाला पसीना,
जब मंद हवाओं से सूखता है,
तब हमें भी ठंडी का अहसास होता है,
मौसम का क्या वो तो बदलता रहता है,
नहीं बदलती तो वो है हमारी जिंदगी,
“क्योंकि साहब, हम वही आम आदमी हैं,
जो जीता है रोज़, मरता है हर दिन।