वसंत ऋतु
वसंत ऋतु
तन्मय सभी बसंत में, नहीं समय है पास |
वो कैसे लेखे भला , टूट रही जो सांस ||
ठूँठ हुये हैं तरु यहाँ , वन भी हो वीरान |
उजड़ रहे है घोसलें , प्रेमातुर नादान||
जाओ भी उनसे कहो, उचित नहीं यह भूल |
गीत उन्हें भाते नहीं , वो तो लगते शूल ||
प्रेम जनक माना रहे , सृष्टि सृजन की मूल |
पर अनुचित है भूलना, हुई यहाँ जो भूल ||
हमीं करे संभव नहीं , बासंती गुणगान |
महिमामंडन में लगे , लोग गहे अभिमान ||
सफर निराला हो यहाँ, आओ रचे विधान |
कथ संवेदनशील हो, गीत बने अभियान ||
संजय निराला