परम आधार
///परम आधार///
हे! परम आधार,
तुम कब होगे साकार।।
शुचि जीवन के उद्गार,
सहज सहर्ष अरु साभार।
अन्तर हृदय सुमन श्रृंगार,
नतमस्तक जीवन बारंबार।।
क्यों धारें जगत विकार,
खोल भाव भरा हृदयागार।
घोल अमृत सुधा संगीत,
खेवन नवजीवन की पतवार।।
साक्षी रूप परम तत्व सूत्राधार,
चैतन्य रूप विलसित अनंत विस्तार।
क्या छोड़ने पर ही प्राण पिंजर,
करुणा अरुण मिलता वह साकार।।
भ्रम मूल जगत की माया,
तब कौन चाहता नश्वर काया।
तुम निराकार परम आधार,
चाह पाऊं तेरी निशिदिन छाया।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट(मध्य प्रदेश)