*गांव में पहला इंजन*

गांव में पहला इंजन
बहुत समय पहले की बात है। हमारे गांव में एक प्रसादी नाम का आदमी रहता था। वह गांव में उस समय बहुत अमीर व्यक्ति था, क्योंकि उस जमाने में उसके पास लगभग 80-90 बीघा जमीन थी। जब लोग नदियों कुओं और ढेकुली से सिंचाई किया करते थे। उस समय उसने सोचा की क्यों न गांव में इंजन लाया जाए। क्योंकि उसने कहीं न कहीं इंजन के बारे में सुना था। उस समय सिंचाई ढेकुली और रहटो से दो या तीन बीघा तक ही हो पाती थी,वह भी बहुत मेहनत करने पर। उस समय गांव और शहरों में मुश्किल से ही किसी के पास इंजन था, जिसे बोरिंग में लगाकर पानी निकाला जाता था।
एक बार प्रसादी मेरठ से एक नया इंजन हमारे गांव में लेने हेतु गया। जब इंजन लेने गया था, तो उसने इंजन स्टार्ट करने के बारे में तो दुकानदार से पूछ लिया था, कि यह किस प्रकार स्टार्ट होगा, लेकिन इंजन बंद कैसे होगा यह पूछने का विचार उसके मन में नहीं आया, इंजन विक्रेता ने भी इसके बारे में कुछ नहीं बताया। गांव में जैसे ही इंजन आया, लोगों की भीड़ उसे देखने के लिए आस-पास के गांवों से आने लगी। उन सभी और गांव वालों की उपस्थिति में इंजन को खेत पर पानी चलाने (सिंचाई करने) के लिए ले जाया गया। इंजन को बोरिंग पर लगाकर भरपूर मात्रा में तेल डालकर स्टार्ट कर दिया गया। इंजन से पहली बार अपने गांव के खेत में पानी चलते देख लोग खुशी के मारे फुले नहीं समा रहे थे। इंजन को खेत पर देखकर सभी लोग खुशी -खुशी घर लौट आए, केवल प्रसादी और उसके पुत्र को छोड़कर। शाम हो गई मगर खेत नहीं भरा। फिर प्रसादी ने अपने पुत्र से कहा, कि खेत रात को ही भर कर घर चलेंगे। फिर प्रसादी ने अपने पुत्र से घर से रजाई गद्दा रात को खेत पर रुकने (सोने हेतु) मंगा लिए। इंजन से पूरी रात पानी चलता रहा।
सुबह मुर्गे की अजान के समय प्रसादी का खेत भर गया। उसने इंजन से कहा-” इंजन अब बंद हो जा, हमारा खेत भर गया है।” इंजन चलता रहा। प्रसादी ने फिर कहा-“कि अरे! भई इंजन अब बंद हो जा, हमारा खेत भर गया है।” इंजन फिर भी चलता रहा, क्योंकि वह तो किसी खुन्टी से बंद होता था, जो उसमें लगी हुई थी। लेकिन प्रसादी को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। प्रसादी ने फिर कहा- “अरे! भई इंजन अब बंद हो जा, हमारा खेत भर गया है।” इंजन फिर भी बंद नहीं हुआ, तो फिर प्रसादी ने क्रोध में आकर कहा- “कि अब तो बंद हो जा! हमें अब नहीं चाहिए!” इंजन फिर भी बंद नहीं हुआ। फिर प्रसादी को बहुत क्रोध आ गया। उसने गुस्से में पास पड़ी रजाई को उसकी भील पर फेंक कर दे मारा और वह पूरी तरह से भील में लिपट गई। अब भी इंजन बंद नहीं हुआ था। फिर उसने इंजन के ऊपर गद्दा, लोही को एक-एक करके फेंक दिया। जब इंजन की भील पर फेंके हुए रजाई गद्दे पूरी तरह से लिपट गये, तब जाकर इंजन बंद हुआ। प्रसादी को यह देखकर बहुत गुस्सा आया। प्रसादी ने उसी समय अपने लड़के को बुलाकर कहा- “कि इसे भैंसागाड़ी में भरकर ले चलो, जहां से लाए थे, कहां से लायेंगे इसके लिए इतने कपड़े, बंद करने के लिए!”
फिर प्रसादी और उसका बेटा इंजन को गाड़ी में भरकर उसी दुकान पर ले गए, जहां से इंजन लेकर आये थे। दुकानदार को कई गाली सुनाने के बाद प्रसादी बोला- “हमें तेरा ऐसा इंजन नहीं चाहिए जो रोज हमारे कपड़ों को फाड़े, खराब करें।” दुकानदार ने पहले पूरी बात ध्यान से सुनी और समझी। प्रसादी ने दुकानदार से सब बीता हाल कह सुनाया। बात सुनकर दुकानदार पहले तो बहुत हंँसा, फिर उसने ताऊ को बहुत तसल्ली के साथ इंजन को बंद करना सिखाया। फिर दोनों पिता- पुत्र खुशी-खुशी इंजन को पुन अपने घर ले आए। अब उन्हें स्टार्ट और बंद करने में कोई परेशानी नहीं होती थी।