खिड़कियों से निकलता धुआं,
खिड़कियों से निकलता धुआं,
अंदर के राज खोल देता है
बरसों से पड़ा था मौन जो
वक्त आने पर वो बोल देता है
जेब भारी हो तब , ये जमाना ,
हर एक बात का मोल देता है
उगते हुआ सूरज देखकर के
हरकोई दरवाजा खोल देता है
✍️कवि दीपक सरल
खिड़कियों से निकलता धुआं,
अंदर के राज खोल देता है
बरसों से पड़ा था मौन जो
वक्त आने पर वो बोल देता है
जेब भारी हो तब , ये जमाना ,
हर एक बात का मोल देता है
उगते हुआ सूरज देखकर के
हरकोई दरवाजा खोल देता है
✍️कवि दीपक सरल