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18 Jan 2025 · 1 min read

मृदुल-पुकार

///मृदुल-पुकार///

आती है दूरस्थ देश से,
किसकी ये मृदुल पुकार।
वाणी है उसकी मूक,
वादक है जगत के पार।।

सुगम वीणा का संगीत,
तरंगित उसकी सहज चितार।
उसका मीठा भाष व रव,
प्रेम की खिलते पुष्प अपार।।

जाने कहां है संसार ये,
दुर्लभ मृदामय जगसार।
करती नवल अठखेलियां,
क्या इसका यही करतार।।

श्रृंखल संवृत्त विश्व लेखा,
बोधिनी तू श्रम्य रम्या।
अतुल विभव वरदायिनी,
पुष्पों लदी वन्य ग्राम्या ।।

सुदृढ़ प्रांतर का सुनहला,
विचरता सृजनमय संसार।
उस पार सागर से कहीं है,
उठती सदा मृदुल झंकार।।

शून्य तंतु के हैं तार खींचे,
बजाता वह अन्तर्ध्यान हो।
उठता वहीं से मूक स्वर,
चिर प्रेम मय संसार हो।।

शून्य संबल पार जग से,
सद्-राह पर करता गति है।
देवत्व का वह नंद नीरव,
परा शून्य ही तो भूपति है।।

वहीं से प्रणय की पवन,
सृजन की सुरभित चेतना।
चतुर्दश कमल पंखुड़ी पर,
क्यों उठती रही है वेदना।।

निस्सीम नीरव ही जगत का,
पुण्यमय पथ उस प्राण तक।
लेकर मुझे तुम पार कर दो,
प्रिय प्राणों के आव्हान तक।।

स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

Language: Hindi
66 Views
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